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बुधवार, 9 सितंबर 2020

कारगिल का शेर – कैप्टन विक्रम बत्रा

 

    दोस्तों ! कारगिल का युद्ध तो आप सभी को याद ही होगा ! जब हर गाँव से कई-कई वीरों ने एकसाथ देश के लिए जान की बाजी लगा दी थी। हर घर का बच्चा-बच्चा देशभक्ति के जोशीले गीत गाकर, देशप्रेम के ही नारे लगा रहा था। हर बच्चा सेना में जाने का ही सपना देखने लगा था। उन अनेकों वीरों में से एक बहादुर व साहसी देशभक्त थे – कैप्टन विक्रम बत्रा। जिन्हें इनकी वीरता एवं साहस के कारण कारगिल का शेर कहा जाने लगा। भारत सरकार द्वारा इन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

    विक्रम का जन्म 9 सितंबर, 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। इनकी माताजी का नाम श्रीमति कमलकान्ता बत्रा एवं पिताजी का नाम श्री जी.एल. बत्रा था। इन्हीं के साथ इनके जुड़वाँ भाई विशाल का भी जन्म हुआ था। इनकी माताजी श्रीरामचरितमानस से बहुत प्रभावित थीं, इसलिए उन्होने इनका नाम लव और इनके जुड़वाँ भाई विशाल का नाम कुश रखा था। इनकी दो बड़ी बहनें भी हैं। इन्होने प्रारम्भिक शिक्षा पालमपुर के ही डी.ए.वी. और सेंट्रल स्कूल से प्राप्त की। ये पढ़ने में बहुत होशियार थे और इसके साथ-साथ टेबल-टेनिस के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। स्कूल के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। सेना छावनी के स्कूल अनुशासन और पिता द्वारा देशप्रेम की कहानियों के प्रभाव से इनमें बचपन से ही देशभक्ति की प्रबल भावना थी। इसके बाद इन्होने डी.ए.वी. कॉलेज, चंडीगढ़ से विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई की। कॉलेज में इन्हें एन.सी.सी. का सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुना गया और इन्होने गणतन्त्र दिवस की परेड में भी हिस्सा लिया।

    इसके बाद 'संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा' (सी.डी.एस.) की तैयारी करते हुए इनका हांगकांग में मर्चेन्ट नेवी में भी चुनाव हो गया था परंतु इन्हें तो सेना में जाना था इसलिए इन्होने उसे ठुकरा दिया था। इसके बाद इनका सी.डी.एस. में चयन हो गया और भारतीय सैन्य अकादमी देहारादून में प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद 6 दिसंबर, 1997 को जम्मू के सोपोर सेना की ’13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। जून 1999 में कारगिल युद्ध में 'हम्प' व 'राकी नाब' स्थानों को जीतने के बाद उन्हें कैप्टन पद दिया गया।

    कैप्टन बनने के बाद इन्हें 'श्रीनगर-लेह-मार्ग' के ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण '5140 चोटी' को पाकिस्तानी सैनिकों से मुक्त करवाने की ज़िम्मेदारी मिली। 20 जून 1999 को सुबह 3:30 पर इस चोटी को इन्होने अपने कब्जे में ले लिया और रेडियो के माध्यम से घोषणा की यह दिल माँगे मोर। इसके बाद इन्हें कारगिल का शेर की उपाधि भी डी गई। इसके अगले दिन अखबारों और टेलीविज़न में विक्रम बत्रा का नाम और अपनी टुकड़ी के साथ चोटी 5140 पर तिरंगा लहराते फोटो छाई हुई थी। इनके कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वाई. के. जोशी के द्वारा इन्हें शेरशाह उपनाम भी दिया था।

    इस जीत के बाद इन्हें एक और बड़ी जीत की ज़िम्मेदारी दी गई। यह थी '4875 वाली संकरी चोटी' पर कब्जा करने की ज़िम्मेदारी। इसे भी इन्होने अपनी टुकड़ी के साथ स्वयं सबसे आगे नेतृत्व करते हुए वीरतापूर्वक पूरा किया। परंतु इस दौरान ये बुरी तरह घायल हो गए और 7 जुलाई, 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए। इनके अदम्य साहस एवं बलिदान को देखते हुए उन्हें 15 अगस्त, 1999 को भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

    सचमुच उनमें शेर का सा साहस व पराक्रम था ! नमन है ऐसे वीर बलिदानी को ! कोटि-कोटि नमन ! बारंबार नमन ! शत-शत वंदन ! वंदे मातरम् !   

कारगिल का शेर – कैप्टन विक्रम बत्रा


मंगलवार, 8 सितंबर 2020

विश्व साक्षरता दिवस

 

       आज 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस है। शिक्षा और साक्षरता पर जितनी भी बातें की जाएँ, कम हैं। यह एक ऐसा विषय है जिस पर आज से पहले भी बहुत सारी चर्चा हो चुकी है। हर बार इन चर्चाओं में शिक्षा की नई आवश्यकताएँ, नई तकनीक, नई विधियाँ बहुत ही रोचक तरीके से सामने आती रही हैं। विश्व साक्षरता दिवस की शुरुआत कब, कैसे हुई एवं इसके उद्देश्य क्या हैं, यह जान लेना भी अति आवश्यक है। युनेस्को द्वारा 17 नवंबर 1965 में 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया गया। पहली बार इसे 8 सितंबर 1966 में मनाया गया। वर्ष 2009-10 में संयुक्त राष्ट्र दशक घोषित किया गया। तब से सम्पूर्ण विश्व में 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य समाज में लोगों का शिक्षा को प्राथमिकता और बढ़ावा देना और दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करना है।

       संयुक्त राष्ट्र की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में लगभग 4 अरब लोग शिक्षित हैं, इसके बावजूद भी 1 अरब लोग अशिक्षित हैं। 2018 की गणना के अनुसार 5 में से 1 व्यक्ति निरक्षर है, और अब विश्व की जनसंख्या 7.7 अरब हो चुकी है। भारत के परिपेक्ष्य में बात करें तो भारत अभी पूर्ण साक्षरता से दूर है। भारत का साक्षरता प्रतिशत वैश्विक स्तर के 75% से काफी नीचे है। भारत में साक्षरता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, इसमें भी महिलाओं का साक्षरता स्तर और भी कम है। भारत में पूर्ण साक्षरता वाला राज्य केरल है, यह बहुत अच्छी खबर है। साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना ही नहीं है, अपितु अपने कर्तव्यों और अधिकारों को जानकर सामाजिक विकास में योगदान देना है। गरीबी, असमानता आदि समस्याएँ भी तभी समाप्त हो सकती हैं।

       इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण शिक्षा पर और भी घनी काली छाया मँडराने लगी है। इस बार की साक्षरता दिवस की थीम है- साक्षरता शिक्षण और कोविड-19: संकट और उसके बाद। इस वर्ष इस अवसर पर शिक्षकों की भूमिका और बदली शिक्षा पद्धति पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसी के तहत सभी सरकारें और शिक्षक इस बार ऑनलाइन शिक्षा पर ही ज़ोर ड़े रहे हैं और तकनीक के माध्यम से शिक्षा प्राप्ति के लक्ष्य को पूरा करने का सफल प्रयास कर रहे हैं।

       शिक्षा के महत्त्व को बताते संस्कृत में भी श्लोक हैं-

1.   माता शत्रु: पिता वैरी येन बालो न पाठित:।

       न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥

       अर्थात् जो अपने बालक को पढ़ाते नहीं, ऐसी माता शत्रु समान और पिता वैरी है, क्योंकि जिस तरह हंसों के बीच बगुले के शोभा नहीं होती, वैसे ही अनपढ़ मनुष्य भी विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते। अत: सभी मनुष्यों को अपनी संतान को शिक्षा जरूर दिलवानी चाहिए।

2.       रूपयौवन संपन्ना विशाल कुल संभवा:।

विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुका:॥

       अर्थात् रूप सम्पन्न, यौवन सम्पन्न और चाहे विशाल कुल में पैदा क्यों न हुए हों, पर जो विद्याहीन हों, तो वे सुगंध रहित केशुड़े के पुष्प की भांति शोभा नहीं देते।

3.       विद्या ददाति विनयम् विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं तत: सुखम्॥

       अर्थात् विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है, अत: सभी सुखों की प्राप्ति के लिए विद्या प्राप्ति अत्यावश्यक है।

        

विश्व साक्षरता दिवस

शनिवार, 5 सितंबर 2020

शिक्षक दिवस

 

                     गुरुर्ब्रहमा गुरुर्विष्णु:, गुरुर्देवो महेश्वर:।

                     गुरु: साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:॥

       गुरु की महिमा बताने वाले इस श्लोक को तो आप सबने कई बार सुना होगा। आज गुरु के सम्मान का ही दिन है। आज 5 सितंबर को सभी भारतवासी शिक्षक दिवस मना रहे हैं और अपने शिक्षकों को धन्यवाद एवं सम्मान दे रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि 5 सितंबर को ही शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है ? 5 सितंबर को भारत के पहले उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रह चुके डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। जब वे राष्ट्रपति बने थे तो उनके कुछ छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने के लिए कहा, तब डॉ. राधाकृष्णन ने उनसे कहा कि- वो उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाएंगे तो उन्हें ज्यादा प्रसन्नता होगी। इसके बाद 1962 से उनके जन्मदिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में प्रत्येक वर्ष मनाया जाने लगा है।

       शिक्षक सिर्फ शिक्षक ही नहीं होता है, वरन् वह राष्ट्र-निर्माता भी होता है। वह केवल विद्यार्थियों को पढ़ाने का कार्य ही नहीं करता है, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का कार्य भी करता है। क्योंकि वह आज जिन नौनिहालों को शिक्षा प्रदान करता है, कल वे ही युवा बनकर देश की बागडोर संभालते हैं। हम कह सकते हैं कि शिक्षक देश के भविष्य को भी चित्रित करते हैं। प्राचीन समय में आश्रम और गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से गुरु अपने विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे। तब माता-पिता संतान को पूर्णरूपेण शिक्षाप्राप्ति तक गुरु को ही सुपुर्द कर देते थे, जहाँ से विद्यार्थी विद्याध्ययन पूर्ण होने पर ही गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था। तब गुरु का स्थान अत्यंत सम्मानजनक माना जाता था। माता-पिता और ईश्वर से भी ऊपर गुरु का स्थान होता था। कबीर जी ने भी कहा है-

                           गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

                           बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

       कबीरजी ने इस दोहे में गुरु को गोविंद अर्थात् ईश्वर से भी ऊँचा और महान बताया है। आधुनिक समय में शिक्षा का परिपेक्ष्य बदल गया है। अब गुरुकुल व्यवस्था नहीं है। विद्यार्थी रोज विद्यालय जाते हैं और रोज ही लौटकर वापस घर भी आते हैं। वर्ष 2020 का समय तो कोरोना महामारी के कारण शिक्षकों के लिए बहुत चुनौतियाँ लेकर आया है। कोरोना के कारण विद्यालय बंद हैं और विद्यार्थी एवं शिक्षक अपने घरों में हैं। ऐसे समय में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए तकनीकी का सहारा लिया गया है। पुस्तक, श्यामपट्ट, और कक्षा का माहौल सबकुछ तकनीक द्वारा ही निर्मित करके रोचक ढंग से विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करना शिक्षकों के लिए आसान कार्य नहीं था। परंतु सभी शिक्षकों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए आपदा को अवसर में बदल दिया।

       मैंने यहाँ अवसर इसलिए कहा क्योंकि बहुत से मेरे शिक्षक भाई-बहन जिन्होने कभी व्हाट्सअप, गूगल आदि नहीं चलाया था, वे सभी अब सफलता-पूर्वक ऑनलाइन कक्षाएँ आयोजित कर पा रहे हैं। सभी अध्यापक-गण अब पीपीटी, वीडियो, ऑनलाइन परीक्षा, क्विज, असाइनमेंट आदि सरलता-पूर्वक करवाने में सक्षम हो गए हैं। इस तरह इस असामान्य माहौल को शिक्षकों द्वारा नवीन सामान्य (न्यू नॉर्मल) बनाने में अहम योगदान रहा है। अध्यापन कार्य में होने के कारण मैंने अपने शिक्षक भाई-बहनों को इन चुनौतियों से रूबरू होते बहुत नजदीकी से देखा और महसूस किया है। परंतु आज मैं अपने शिक्षिका होने पर गर्व करती हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि मैं एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का हिस्सा हूँ। ईश्वर का कोटि-कोटि धन्यवाद है कि उन्होने मुझे इस कार्य के लिए चुना और इस भूमिका को अच्छी तरह निभाने का सामर्थ्य भी मुझे प्रदान किया।

                           शिक्षक है राष्ट्र-निर्माता, करता नव-निर्माण है।

                           देश की प्रगति देती, हरदम इसका प्रमाण है॥


                                            गुरवे नम: 



 
 



 
      

गुरुवार, 3 सितंबर 2020

क्षमावाणी पर्व

 

       क्षमा का महत्त्व सभी धर्मों में एक समान ही बताया गया है। इसी महत्त्व को दर्शाता जैन धर्म का त्योहार है- पर्युषण पर्व। दिगंबर जैनी इसे 10 दिवसीय और श्वेतांबर जैनी 8 दिवसीय मनाते हैं। पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है। इसमें सभी से क्षमा माँगी जाती है और सभी को क्षमा किया भी जाता है। इसमें भगवान महावीर कहते हैं- सब जीवों को मैं क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें। सब जीवों से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर भाव नहीं रहे। क्षमा मनुष्य को बड़ा व महान बना देती है। क्षमा हमें झुकना सिखाती है। क्षमा से तनाव दूर हो जाता है, मन शांत हो जाता है, जबकि क्रोध आने पर हमारा चित्त अशांत हो जाता है और मन में बैर-द्वेष की भावना घर कर जाती है। क्षमा वाणी पर्व पर क्षमा को जीवन में उतारना ही सच्ची मानवता है।

       अब आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठ सकता है कि क्षमा से जब चित्त शांत होता है, तो हमें हमेशा ही क्षमा करना और माँगना चाहिए, इसके लिए कोई एक विशेष दिन ही क्यों चुना जाए ? इसको हम इस तरह समझ सकते हैं कि – क्षमा माँगना सरल भी नहीं है, हर कोई हर किसी से आसानी से क्षमा नहीं माँग सकता है। बहुत बार तो मनुष्य दिल से चाहता है पर संकोच या शर्म के कारण नहीं माँग पाता है। कई बार बेबसी में कोई और उपाय नहीं दिखाई देने पर माँगता है। कभी-कभी किसी के दबाव में आकर जबर्दस्ती माँगना पड़ता है एवं कई बार तो अहम आड़े आ जाता है और मनुष्य क्षमा माँगता ही नहीं है।

       उपर्युक्त किसी भी तरह की क्षमा माँगने का कोई मतलब या अर्थ नहीं रह जाता है, जब तक वह सच्चे मन से और शांत चित्त से न माँगी जाए। इन सभी दुविधाओं के हल के रूप में क्षमावाणी पर्व का एक विशेष दिन सभी को क्षमा माँगने और करने के लिए निश्चित कर दिया गया। इस दिन सभी तरफ क्षमा का ही वातावरण बन जाता है तो किसी को भी कोई असुविधा नहीं होती है और क्षमा माँगना व करना दोनों ही आसान हो जाते हैं। जैन धर्म में इसे मिच्छामि दुक्कड़म कहने की परंपरा के साथ क्षमा माँगी जाती है। यहाँ मिच्छामि अर्थात् क्षमा करना और दुक्कड़म अर्थात् बुरे कर्मों को है, अर्थात् मेरे बुरे कर्मों के लिए मुझे क्षमा कीजिए।

       महात्मा गाँधी ने भी क्षमा के संबंध में कहा है ‘’बिना क्षमा के कोई प्रेम नहीं है और बिना प्रेम के कोई क्षमा नहीं है।’’ रहीम जी का एक बहुत प्रसिद्ध दोहा भी क्षमा के महत्त्व का ही बखान करता है-

                     क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उतपात।

                     का रहीम हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात॥

       अर्थात् उद्दंडता करने वाले हमेशा छोटे ही कहे जाते हैं और क्षमा करने वाले बड़े बनते हैं। ऋषि भृगु ने भगवान विष्णु की सहिष्णुता परखने के लिए उनके सीने पर पाद-प्रहार कर दिया। परंतु क्षमामूर्ति प्रभु लक्ष्मीनाथ ने विनम्रता से उनको कहा- ‘’ हे ऋषिवर ! कहीं आपके पाँव में चोट तो नहीं लगी ? मेरा सीना तो वज्र के समान कठोर है और आपके चरण-कमल अत्यंत कोमल हैं !’’ यह सुनकर भृगु बहुत शर्मिंदा हुए और छोटे ही प्रमाणित हुए जबकि महान भगवान का कद और ऊँचा हो गया।

       क्षमा को वीरों का आभूषण भी कहा गया है- क्षमा वीरस्य भूषणम्। इसी अर्थ को बताता एक संस्कृत श्लोक है-

                     क्षमा बलम् अशक्तानाम्, शक्तानाम् भूषणम् क्षमा।

                     क्षमा वशीकृते लोके, क्षमया किं न साधयति॥

       अर्थात् क्षमा निर्बलों की शक्ति और बलशाली का आभूषण है। सारा संसार क्षमा से वश में किया जा सकता है, इससे सभी कार्य सिद्ध हो सकते हैं।

       एक अन्य श्लोक के माध्यम से क्षमाशील को महान बताया गया है-

                     पुष्प कोटि समम् स्तोत्रम्, स्तोत्र कोटि समम् जप:।

                     जप कोटि समम् ध्यानम्, ध्यान कोटि समम् क्षमा॥

       अर्थात् एक करोड़ पुष्पों के समान एक स्तोत्र, एक करोड़ स्तोत्रों के समान एक जप, एक करोड़ जपों के समान एक ध्यान और एक करोड़ ध्यान के समान एक बार की क्षमा होती है।

       अत: जो मनुष्य क्षमावान और क्षमाशील बन जाता है, वह महान हो जाता है। आइए हम भी अपने मन में यह प्रण करें कि अहम का त्याग करके सभी को क्षमा करेंगे और सभी से क्षमा माँगेंगे। यह सोच और विचार मन में धारण करके जीवन में अपना लें तो हर दिन क्षमा पर्व होगा और चित्त भी शांत रहेगा।  


मिच्छामि दुक्कड़म

        

बुधवार, 2 सितंबर 2020

विश्व नारियल दिवस

 

       नारिकेलम् अर्थात् नारियल का नाम तो सभी ने सुना ही होगा। संस्कृत में नारियल को नारिकेलम् कहते हैं। हिन्दू धर्म में नारियल को पवित्र माना जाता है और पूजा में भी प्रयोग किया जाता है। क्या आप जानते हैं कि आज 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस है। इसे मनाने की शुरुआत वर्ष 2009 में हुई थी। प्रत्येक वर्ष इसकी एक थीम भी रखी जाती है। इस वर्ष की थीम है- दुनिया को बचाने के लिए नारियल में निवेश। 2 सितंबर को विश्व नारियल दिवस मनाने का उद्देश्य है- नारियल के महत्त्व को समझना और समझाना, इसके अधिकाधिक उपयोग को बढ़ावा देना और इस खेती और इससे जुड़े व्यवसाय के बारे में लोगों को जानकारी देना। आज के दिन नारियल से बनी भिन्न-भिन्न चीजों की प्रदर्शनियाँ लगाई जाती है।

       नारियल हमारे लिए बहुत उपयोगी है। इसका प्रत्येक भाग मनुष्य के प्रयोग में आता है और लाभदायक होता है। प्लास्टिक की थैली के विकल्प में हम नारियल की जटा से बने थैले प्रयोग कर पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचा सकते हैं और प्लास्टिक बंद होने पर बेरोजगार होने वाले मजदूरों का काम भी दे सकते हैं। नारियल की कृषि भारत के दक्षिणी राज्य केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में बहुतायत रूप से की जाती है। इससे लगभग 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिलता है और भारत का 90% नारियल भी यहीं से मिलता है। नारियल की खेती समुद्री किनारे की नमकीन मिट्टी में की जाती है।

       नारियल का पानी पीना सभी को बहुत पसंद होता है। यह हमारे स्वास्थ्य और त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है। नारियल के पकने पर इसका सफ़ेद भाग भी खाने के काम आता है, और इसके सूखे एवं गीले सफ़ेद भाग से कई स्वादिष्ट व्यंजन एवं चॉकलेट भी बनाई जाती है। इसके खोल और रेशों से थैले, गद्दे, रस्सी, पायदान, चटाई आदि के अलावा कई प्रकार के सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं। इसके छिलकों का चूरा (कोकोपीट) पौधों के लिए बहुत अच्छी खाद का काम भी करता है। नारियल पूजा में भगवान को भी चढ़ाया जाता है। इससे पूजा सामग्री, सुगंधित धूप, हवन सामग्री आदि भी बनाई जाती है। नारियल तेल के गुण और महत्त्व से कोई भी अनजान नहीं होगा। दक्षिण में नारियल तेल खाद्य तेल के रूप में भी प्रयोग किया जाता है और बाकी समस्त भारत में बालों के लिए तो इसका प्रयोग हर घर में होता ही है। नारियल के दूध और गिरि से भी दक्षिण भारत में कई तरह के स्वादिष्ट पकवान बनाए जाते हैं।

       नारियल से बनी चीजों का उपयोग केवल भारत में ही नहीं किया जाता है बल्कि विदेशों में भी इनका निर्यात किया जाता है। नारियल की बनी चीजों के निर्यात से भारत को लगभग 470 करोड़ रूपए की आय होती है। नारियल का वैज्ञानिक नाम है-कोकस न्यूसीफेरा। यह पाम ट्री परिवार से संबन्धित पेड़ है। भारत के अलावा कई अन्य देशों में भी नारियल की खेती की जाती है। ये देश हैं- फ़िजी, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, ब्राज़ील, श्रीलंका, सोलोमन आइलैंड, थाईलैंड, टोंगा, वियतनाम, जमैका, केनिया, पपुआ न्यू गिनिया, मार्शल आइलैंड, किरिबाटी, फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माईक्रोनेशिया आदि। इनमें भी सर्वाधिक खेती जहाँ होती है वे देश भारत, श्रीलंका, ब्राज़ील, फिलीपींस और इंडोनेशिया हैं।

       नारियल स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभप्रद है। आइए नारियल के कुछ फ़ायदों के बारे में जानते हैं-

1.   त्वचा को चमकदार और स्वस्थ रखता है।

2.   मोटापे को कम करने में लाभदायक है।

3.   शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करता है।

4.   उच्च रक्तचाप में लाभदायक है।

5.   कोशिकाओं को होने वाले नुकसान से बचाता है।

6.   बढ़ती चर्बी और कोलेस्ट्रॉल को कम करता है।

7.   शरीर में पानी की कमी को दूर करता है।

8.   आयरन की मात्र होने के कारण रेड ब्लड सेल्स की भी रक्षा करता है।

9.   इसमें पाए जाने वाले मैंगजीन, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स हड्डियों के लिए लाभदायक हैं।

10. नारियल पानी लू और गर्मी से भी बचाता है।

दोस्तों ! आज के बाद जब भी नारियल या नारियल से बनी कोई चीज खाएँ या प्रयोग करें तो गुणकारी नारियल के महत्त्व को कम नहीं आंकना !

गुणों की खान- नारियल


  

सोमवार, 31 अगस्त 2020

ओणम पर्व

 

      भारत त्योहारों का देश है। जिस तरह एक बगीचे में सभी रंगों के पुष्प अपनी सुगंध और सुंदरता से सबका मन मोह लेते हैं, वैसे ही भारत भी अनेक धर्म, त्योहारों, वेशभूषा, बोली, खान-पान, रहन-सहन से हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। इतनी विविधताओं के बीच भी माला के एक सूत्र की तरह एकता में बंधा मेरा देश यूँ ही महान नहीं कहलाता है!

       रंगीले भारत के अनेक प्रसिद्ध पर्वों में से आज मैं यहाँ दक्षिण भारतीय पर्व ओणम की बात कर रही हूँ। ओणम दक्षिण भारत के केरल में विशेष धूमधाम के साथ मनाया जाता है। यह वहाँ का राजकीय पर्व भी है। ओणम 10 दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है। इस वर्ष यह 22 अगस्त, 2020 से प्रारम्भ होकर 2 सितंबर, 2020 तक मनाया जा रहा है। मान्यता है कि ओणम के दिन ही राजा महाबली अपनी सम्पूर्ण प्रजा से मिलने के लिए पृथ्वी पर आते हैं। राजा महाबली असुरराज थे, परंतु विष्णु के परम भक्त भी थे। इस त्योहार की कथा विष्णु जी के वामन अवतार से जुड़ी है। यह कथा इस प्रकार है-

       असुरराज महाबली दानी और दयालु थे। वे अपनी प्रजा से अत्यंत स्नेह करते थे। वे असुरों के राजगुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से 100 यज्ञ करके तीनों लोकों पर प्रभुत्व जमाना चाहते थे। तब बलि के 99 यज्ञ पूर्ण करने के बाद सौवें यज्ञ से पहले देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु वामन अवतार में बलि की परीक्षा लेते हैं, और दान में तीन पग भूमि माँगते हैं। बलि के द्वारा इसे देने का संकल्प लेने पर वामन भगवान अपना पहला पग धरती, दूसरा पग स्वर्ग और तीसरा पग रखने के लिए स्थान मांगने पर बलि द्वारा आगे किए उसके सिर पर पग रख देते हैं। वामन भगवान द्वारा तीसरा पग उसके सिर पर रखते ही वह पाताल लोक में चला जाता है। इसके बाद बलि भगवान से वर्ष में एकबार अपनी प्रजा से मिलने का वरदान माँगते हैं, जिसे विष्णु भगवान स्वीकार कर लेते हैं। तभी से यह मान्यता है कि महाबली राजा अपनी प्रजा से मिलने थिरुओणम के दिन पृथ्वी पर आते हैं।

       मलयाली लोग राजा बलि और विष्णु अवतार वामन भगवान का स्वागत करने के लिए घरों की आकर्षक सजावट करते हैं। इस दिन 26 प्रकार के विशेष शाकाहारी व्यंजन बनाकर, उन्हें केले के पत्ते पर सजाकर भगवान वामन और राजा महाबली को भोग के रूप में अर्पित किए जाते है। इस तरह की तैयार की गई विशेष थाली को साध्या थाली कहा जाता है। इसके साथ ओणम कृषि पर्व भी है। यह नई फसल के आने की खुशी में भी मनाया जाता है। केरल में इन दिनों चाय, अदरक, इलायची, काली मिर्च, धान आदि फसल पाक कर तैयार हो जाती है। यह त्योहार भारत के अनेक हिस्सों में मनाए जाने वाले हिन्दू त्योहार दशहरा और दीपावली के मिश्रित रूप जैसा है। इसमें भी दिवाली की तरह घरों की साफ-सफाई और सजावट की जाती है। इसमें पहले दिन से ही फूलों से चक्र के समान गोल रंगोली बनाई जाती है, जिसे पूकलम कहा जाता है। पहले यह छोटी होती है परंतु आठ दिनों तक रोज इसके चारों तरफ एक चक्र और बना दिया जाता है, जिससे यह एक विशाल रंगोली बन जाती है। 9वें दिन इसे दीपक जलाकर सजाया जाता है और विष्णु की मूर्ति तथा गणपति की पूजा होती है। यह त्योहार मंदिरों में जाकर नहीं अपितु घरों में रहकर ही मनाया जाता है। इस दिन विशेष पकवान बनाए जाते हैं, विशेषकर चावल, गुड़ और नारियल के दूध को मिलाकर खीर बनाई जाती है, जिसे पायसम कहा जाता है। ओणम पर सभी एक दूसरे के गले मिलकर शुभकामना और बधाई भी देते हैं। इस दौरान सर्प नौका दौड़, कथकली नृत्य एवं अनेक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है।

       मलयालम पंचांग कोलावर्षं के अनुसार यह त्योहार प्रथम मास छिंगम में मनाया जाता है। मलयाली हिन्दू धर्म के लोगों के लिए यह नव वर्ष का आरंभ भी होता है। यह पर्व केरल के त्रिक्काकरा (कोच्ची के पास) एकमात्र वामन मंदिर से प्रारम्भ किया जाता है। फूलों की चक्राकार रंगोली के चारों तरफ युवतियाँ नृत्य भी करती हैं, जिसे तिरुवाथिरा कलि कहा जाता है। वामन अवतार विष्णु को त्रिक्काकरप्पन नाम से जाना जाता है। राजा महाबली और उनके अंगरक्षकों की प्रतिष्ठा की जाती है, जो कच्ची मिट्टी से बनाई जाती है। दसवें दिन विष्णु, गणपति, बलि और अंगरक्षकों सभी मूर्तियों को पूजा करने के बाद विसर्जित कर दिया जाता है।

       इस तरह ओणम एक संपूर्णता से भरा हुआ त्योहार है जो समाज में समरसता की भावना, प्रेम और भाईचारे का संदेश देता है। 


ओणम की झलकियाँ 

 

महा टीकाकरण अभियान (MEGA VACCINATION PROGRAMME)

  वैक्सीन लगवाओ ए दोस्तों , कोविड भगाओ ए दोस्तों। आगे आओ ए दोस्तों , भ्रम न फैलाओ ए दोस्तों।   वैक्सीन जो तुम लगवाओगे , कोरोना को त...