हिन्दी साहित्य के एक युग को जो नाम दिया गया है, वो है- ‘प्रेमचंद युग’। प्रेमचंद ने अपने लेखन में हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं का प्रयोग किया था। वे हिन्दी और उर्दू साहित्य जगत में समान रूप से लोकप्रिय हैं। उनकी सभी रचनाओं का अनुवाद इन दोनों ही भाषाओं में किया गया है। आज उनके जन्म की 140 वीं वर्षगांठ है, परंतु उनका लेखन जैसा आज के 100-125 वर्षों पहले समयानुकूल लगता था, वैसा ही समकालीन वर्तमान में भी है।
मुंशी
प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के लमही नामक गाँव में 31 जुलाई 1880 में हुआ था। इनका
वास्तविक नाम धनपत राय श्री वास्तव था। लेखन काल के प्रारम्भिक 5-6 वर्षों
तक इन्होने नवाब राय नाम से उर्दू लेखन कार्य किया। यह नाम इन्हें इनके
पिता द्वारा स्नेहपूर्वक दिया गया था, और इन्हें भी यह
बहुत प्रिय था। 1908 ई. में ‘सोजे वतन’ नामक इनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ। यह कहानी संग्रह देशभक्ति की
भावना से भरा होने के कारण अंग्रेजी सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित करके इसकी सभी
प्रतियों को भी जब्त कर लिया गया और इसके लेखक को भविष्य में लेखन कार्य न करने की
चेतावनी भी दी गई।
तत्पश्चात
इन्होने नाम बदलकर प्रेमचंद नाम से पुनः लिखना शुरू किया, लेकिन इस बार इन्होने हिन्दी में लेखन प्रारम्भ किया। प्रेमचंद नाम से
इनकी पहली हिन्दी कहानी ‘बड़े घर की बेटी’ उस समय की प्रसिद्ध ‘जमाना’ पत्रिका में 1910 में प्रकाशित हुई। इसके बाद तो पत्र-पत्रिकाओं में उनकी
लेखन कला का दौर चल पड़ा। 1918 में उनका पहला हिन्दी उपन्यास ‘सेवा सदन’ प्रकाशित हुआ जो अत्यन्त लोकप्रिय
हुआ। इस तरह उन्होने लगभग 300 कहानियाँ तथा 18 उपन्यास लिखे। 1921 में असहयोग
आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया, और पूर्णरूप से हिन्दी साहित्य के निर्माण के लिए समर्पित हो गए। इन्होने
कुछ समय तक ‘मर्यादा, माधुरी और हंस’ पत्रिकाओं का सम्पादन कार्य भी किया। हिन्दी साप्ताहिक पत्र ‘जागरण’ का
भी कुछ वर्षों तक प्रकाशन कार्य किया।
1920-36
तक मुंशी जी करीब 10 से ज्यादा कहानियाँ प्रत्येक वर्ष लिखते रहे। 18 अक्तूबर 1936
में जब इनका देहावसान हुआ तो उसके उपरांत इनकी कहानियाँ ‘मानसरोवर’ नाम से 8 खण्डों में प्रकाशित
हुईं। इनके लिखे उपन्यासों में जो सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं, वे हैं- सेवा सदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि हैं।
कुछ बहुत प्रसिद्ध कहानियाँ हैं- कफ़न, पूस की रात, पंच-परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि।
प्रेमचंद
ने हिन्दी साहित्य जगत को अपने लेखन से जो सौगात दी है, वह अद्भुत है, अतुलनीय है। इनके लेखन से हिन्दी
फ़िल्म-जगत भी अछूता नहीं रहा। सत्यजीत राय ने उनकी लिखी कहानियों पर 1977 में ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और 1981 में ‘सद्गति’ नामक फिल्में बनाईं। 1938 में
सुब्रमण्यम ने ‘सेवा सदन’ फ़िल्म
बनाई। 1977 में मृणाल सेन ने ‘कफ़न’ कहानी पर आधारित ‘ओका ऊरी कथा’ तेलुगू फ़िल्म बनाई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फ़िल्म
का पुरस्कार भी मिला। 1963 में ‘गोदान’ और 1966 में ‘गबन’ पर
भी फिल्में बनाई गईं। 1980 में ‘निर्मला’ उपन्यास पर एक टीवी धारावाहिक बनाया गया जो बहुत ही लोकप्रिय हुआ था।
मुंशी
जी अपने अंतिम समय तक लेखन कार्य में ही लगे रहे। उनका अंतिम निबंध ‘महाजनी सभ्यता’, अंतिम व्याख्यान ‘साहित्य का उद्देश्य’, अंतिम कहानी ‘कफ़न’, अंतिम पूर्ण उपन्यास ‘गोदान’ और अंतिम अधूरा उपन्यास ‘मंगलसूत्र’ माने जाते हैं। उनके लेखन के योगदान
को हम इस तरह समझ सकते हैं कि 1918-1936 ई. तक के काल को ही ‘प्रेमचंद युग’ कहा जाने लगा है। आज इनके लिखे
साहित्य का अनुवाद सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में हो चुका है,
इसमें अंग्रेजी भाषा भी शामिल है। आज हिन्दी साहित्य जगत की कल्पना प्रेमचंद के
बिना करना बेमानी है, अकल्पनीय है।
सीमा शर्मा
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| 31 जुलाई 1880 - 18 अक्तूबर 1936 |








