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शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

उपन्यास सम्राट- प्रेमचंद

     हिन्दी साहित्य के एक युग को जो नाम दिया गया है, वो है- प्रेमचंद युग। प्रेमचंद ने अपने लेखन में हिन्दी और उर्दू दोनों ही भाषाओं का प्रयोग किया था। वे हिन्दी और उर्दू साहित्य जगत में समान रूप से लोकप्रिय हैं। उनकी सभी रचनाओं का अनुवाद इन दोनों ही भाषाओं में किया गया है। आज उनके जन्म की 140 वीं वर्षगांठ है, परंतु उनका लेखन जैसा आज के 100-125 वर्षों पहले समयानुकूल लगता था, वैसा ही समकालीन वर्तमान में भी है।

     मुंशी प्रेमचंद का जन्म वाराणसी के लमही नामक गाँव में 31 जुलाई 1880 में हुआ था। इनका वास्तविक नाम धनपत राय श्री वास्तव था। लेखन काल के प्रारम्भिक 5-6 वर्षों तक इन्होने नवाब राय नाम से उर्दू लेखन कार्य किया। यह नाम इन्हें इनके पिता द्वारा स्नेहपूर्वक दिया गया था, और इन्हें भी यह बहुत प्रिय था। 1908 ई. में सोजे वतन नामक इनका पहला कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ। यह कहानी संग्रह देशभक्ति की भावना से भरा होने के कारण अंग्रेजी सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित करके इसकी सभी प्रतियों को भी जब्त कर लिया गया और इसके लेखक को भविष्य में लेखन कार्य न करने की चेतावनी भी दी गई।

     तत्पश्चात इन्होने नाम बदलकर प्रेमचंद नाम से पुनः लिखना शुरू किया, लेकिन इस बार इन्होने हिन्दी में लेखन प्रारम्भ किया। प्रेमचंद नाम से इनकी पहली हिन्दी कहानी बड़े घर की बेटी उस समय की प्रसिद्ध जमाना पत्रिका में 1910 में प्रकाशित हुई। इसके बाद तो पत्र-पत्रिकाओं में उनकी लेखन कला का दौर चल पड़ा। 1918 में उनका पहला हिन्दी उपन्यास सेवा सदन प्रकाशित हुआ जो अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। इस तरह उन्होने लगभग 300 कहानियाँ तथा 18 उपन्यास लिखे। 1921 में असहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया, और पूर्णरूप से हिन्दी साहित्य के निर्माण के लिए समर्पित हो गए। इन्होने कुछ समय तक मर्यादा, माधुरी और हंस पत्रिकाओं का सम्पादन कार्य भी किया। हिन्दी साप्ताहिक पत्र जागरण का  भी कुछ वर्षों तक प्रकाशन कार्य किया।

     1920-36 तक मुंशी जी करीब 10 से ज्यादा कहानियाँ प्रत्येक वर्ष लिखते रहे। 18 अक्तूबर 1936 में जब इनका देहावसान हुआ तो उसके उपरांत इनकी कहानियाँ मानसरोवर नाम से 8 खण्डों में प्रकाशित हुईं। इनके लिखे उपन्यासों में जो सर्वाधिक लोकप्रिय रहे हैं, वे हैं- सेवा सदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान आदि हैं। कुछ बहुत प्रसिद्ध कहानियाँ हैं- कफ़न, पूस की रात, पंच-परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा आदि।

     प्रेमचंद ने हिन्दी साहित्य जगत को अपने लेखन से जो सौगात दी है, वह अद्भुत है, अतुलनीय है। इनके लेखन से हिन्दी फ़िल्म-जगत भी अछूता नहीं रहा। सत्यजीत राय ने उनकी लिखी कहानियों पर 1977 में शतरंज के खिलाड़ी और 1981 में सद्गति नामक फिल्में बनाईं। 1938 में सुब्रमण्यम ने सेवा सदन फ़िल्म बनाई। 1977 में मृणाल सेन ने कफ़न कहानी पर आधारित ओका ऊरी कथा तेलुगू फ़िल्म बनाई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फ़िल्म का पुरस्कार भी मिला। 1963 में गोदान और 1966 में गबन पर भी फिल्में बनाई गईं। 1980 में निर्मला उपन्यास पर एक टीवी धारावाहिक बनाया गया जो बहुत ही लोकप्रिय हुआ था।

     मुंशी जी अपने अंतिम समय तक लेखन कार्य में ही लगे रहे। उनका अंतिम निबंध महाजनी सभ्यता, अंतिम व्याख्यान साहित्य का उद्देश्य, अंतिम कहानी कफ़न, अंतिम पूर्ण उपन्यास गोदान और अंतिम अधूरा उपन्यास मंगलसूत्र माने जाते हैं। उनके लेखन के योगदान को हम इस तरह समझ सकते हैं कि 1918-1936 ई. तक के काल को ही प्रेमचंद युग कहा जाने लगा है। आज इनके लिखे साहित्य का अनुवाद सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में हो चुका है, इसमें अंग्रेजी भाषा भी शामिल है। आज हिन्दी साहित्य जगत की कल्पना प्रेमचंद के बिना करना बेमानी है, अकल्पनीय है।


सीमा शर्मा


31 जुलाई 1880 - 18 अक्तूबर 1936

गुरुवार, 30 जुलाई 2020

राखी का बंधन

                         राखी का बंधन, निभाएँ भाई और बहन।

                         धागे का एक सूत्र, रिश्ता जोड़े गहन।

       दोस्तों! श्रावण मास की पूर्णिमा, 3 अगस्त, 2020 को बहन-भाई का प्रिय त्योहार रक्षा-बंधन आने वाला है। इस दिन के लिए सभी भाई-बहनों में उत्साह रहता है, परंतु इस बार इस त्योहार को हमें थोड़े से परिवर्तन के साथ अलग ढंग से मानना होगा। जैसा कि आप सब जानते हैं, आज भारत के साथ-साथ पूरा विश्व कोरोना नामक महामारी से जूझ रहा है। इस बीमारी कि अभी कोई औषधि भी नहीं आई है, इसलिए सुरक्षा ही बचाव है। इस बीमारी में सामाजिक दूरी बनाकर ही हमें स्वयं को व सबको बचाते हुए ही आगे बढ़ना है।

       इस बार जो बहन-भाई दूर हैं, वो राखी पर एक-दूसरे के पास आ-जा नहीं सकते हैं। बहनें भी बाजार बंद होने के व कोरोना से बचाव के कारण राखी नहीं खरीद पाई हैं। कुछ बहनें अगर खरीद भी पाई हैं तो, उनको पार्सल करके भाई तक पहुँचने तक कि प्रक्रिया में बहन को कई जगह जाना पड़ेगा और पार्सल को भी कई हाथों से गुजरना पड़ेगा। यह लंबी प्रक्रिया कोरोना को भी निमंत्रण दे सकती है। इन सारी स्थितियों को देखते हुए क्यों ना जो बहनें दूर हैं, वहीं से भाई को फोन पर संदेश या बात करके कलावा या मोली ही बांधने को कहें।

       जो बहन-भाई पास हैं या साथ ही रहते हैं, वो बहनें घरेलू सामान से अपने हाथों से भाइयों के लिए राखी बनाएँ। इससे आपको भी अधिक खुशी मिलेगी और भाई के भी वो राखी और आपकी भावनाएं ज्यादा दिल के करीब होंगी। वैसे तो आजकल सभी स्कूलों में आर्ट एंड क्राफ्ट में राखी मेकिंग सिखाते हैं, फिर भी यदि कुछ बहनों को किसी प्रकार की परेशानी हो तो घर की बड़ी-बूढ़ी औरतों से और यू-ट्यूब व गूगल से भी राखी बनाना सीख सकती हैं। घर पर हम रंग-बिरंगी डोरी, छोटी-छोटी कपड़े की कतरनें, साटिन रिबन, बटन, घुँघरू, मोती, सितारे, रंग-बिरंगे चमकीले छोटे पत्थर या डायमंड, पेपर क्विलिंग आदि से बहुत सुंदर और टिकाऊ राखी बना सकते हैं।

       मुझे याद है, बचपन में घर पर माँ, दादी, मासी, बुआ जी आदि राखी से कुछ दिन पहले से ही दोपहर के खाली समय में राखी बनाती थी। राखी वाले दिन वो ही राखी मामाजी और उनके परिवार को बांधी जाती थी। तभी उनके साथ बैठ कर मैं और बड़ी बहन भी राखी बनाना सीख गयी थी। अपने हाथों से बनी राखी देखकर बहुत खुशी होती थी और यह खुशी तब दुगुनी हो जातिथि जब भाई से पूछ कर उसकी पसंद के रंग और डिजाइन की राखी बनाते थे। भाई भी उस राखी को बांध कर फूला नहीं समाता था।

       आज जैसा कि आप सब जानते हैं, चीन ने हमारे हर त्योहारी बाजार पर कब्जा कर रखा है। हमारे किसी भी त्योहार में बाजार में चीनी उत्पादों कि भीड़ लगी रहती है। यह समय जब चीन भारत कि सीमा पर हमारे जवानों को आंखे दिखा रहा है तो हमारी तरफ से भी चीन को करारा जवाब देने का है। इसके लिए हमें सीमा पर जाकर बंदूक उठाने की आवश्यकता नहीं है, बस हमें अपने घर पर ही रहना है। बाहर बाजार में जाकर ना ही तो चीनी उत्पाद राखी खरीदनी है, और ना ही चीनी वायरस को घर पर निमंत्रण देना है। हमें अपनी देशभक्ति दिखने का इससे आसान तरीका और क्या मिलेगा!

       आइए! सभी भाई-बहन आज ये प्रतिज्ञा करें कि इस बार अपने घर पर ही कलावा या हाथ कि बनी राखी ही बांधेंगे, और इस तरह हम घर बैठे-बैठे ही कोरोना और चीन को मुंह-तोड़ जवाब देंगे।

सीमा शर्मा 


बहन-भाई के प्यार का रक्षा सूत्र
 


बुधवार, 29 जुलाई 2020

राष्ट्रीय पशु – बाघ

      भारत के राष्ट्रीय पशु बाघ को तो आप जानते ही हैं। परंतु क्या आप जानते हैं कि हमारे राष्ट्रीय पशु का जीवन अभी संकट में है, क्योंकि इनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है। मनुष्य द्वारा जंगलों को कम करने और अवैध रूप से इनका शिकार करने के कारण इनके जीवन पर यह संकट छाया है। भारत में बाघों कि गिरती संख्या को देखते हुए 1973 में बाघ परियोजना शुरू की गई। इस परियोजना का उद्देश्य बाघों का संरक्षण करना था। इसके तहत बाघों के 27 आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की गई, जिनमें 37,761 वर्ग किलोमीटर एरिया आता है।

       बाघ पूरी दुनिया में पाए जाते हैं। इसलिए बाघों की घटती संख्या को देखकर पूरी दुनिया का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। इसी चिंता के कारण 29 जुलाई, 2010 को सेंट पीटर्सबर्ग में टाईगर समिट का आयोजन किया गया था, जिसमें साल का एक दिन ’29 जुलाई बाघों के नाम समर्पित किया गया। तभी से प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बाघों के आवास-स्थल को बढ़ावा देना और उनके संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाना है। यदि इनकी संख्या को बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया गया तो ये बहुत जल्दी समाप्त हो जाएंगे। इनकी समाप्ती पूरी दुनिया और पर्यावरण के लिए शुभ संकेत नहीं है।

       29 जुलाई को दुनिया भर में बाघों से संबन्धित आंकड़ों को साझा किया जाता है। हमारे यहाँ भारत में प्रत्येक 4 वर्षों के अंतराल पर बाघों की गणना की जाती है। 2006 में इनकी संख्या 1,411, 2010 में 1,706, 2014 में 2,226 और 2018 में 2,967 हो गई थी। अगली गणना 2022 में होगी। आंकड़ों पर नजर डालें तो इनकी संख्या में पिछले 15 सालों में कुछ वृद्धि दर्ज की गई है, जो एक सराहनीय प्रयास है।

       पहले 1915 में इनकी संख्या एक लाख थी। अभी दुनिया में सिर्फ 6,000 बाघ ही बचे हैं, जिनमें से 3,891 बाघ अकेले भारत में हैं। बीती एक सदी में बाघों की लगभग 97% आबादी समाप्त प्राय हो चुकी है। बाघों की 9 प्रकार की प्रजातियों में से 3 प्रजातियाँ पूर्णरूपेण विलुप्त हो चुकी हैं। वर्तमान में केवल 6 प्रजातियों के अस्तित्व को जिंदा रखने की लड़ाई सम्पूर्ण विश्व लड़ रहा है, जिसमें भारत अग्रणी है। समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इन 6 प्रजातियों की विलुप्तता भी निश्चित है। भारत में सबसे ज्यादा बाघ क्रमशः मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तराखंड में पाए जाते हैं।

       बाघों को बचाकर हम पर्यावरण को भी समृद्ध बनाते हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि भारत और भारतीय संस्कृति तो वैदिक युगों से ही सह-अस्तित्व की शिक्षा देती आई है। हमारे तो सभी देवी-देवताओं के साथ भी पशु-पक्षी जुड़े हुए हैं, जैसे- शिवजी के साथ सर्प और बैल, माँ दुर्गा के साथ सिंह, गणेशजी  के साथ हाथी और चूहा, कार्तिकेय के साथ मोर, विष्णु जी के साथ शेषनाग और गरुड़, लक्ष्मी जी के साथ उल्लू, कृष्ण जी के साथ गाय, सरस्वती जी के साथ हंस, हनुमान जी के साथ बंदर आदि। इसलिए हमें तो पशु-पक्षियो के साथ स्नेह-पूर्वक सामञ्जस्य रखते हुए जीने की कला पुरातन काल से ही हमारे पूर्वजों द्वारा सिखाई गई है, अब बस हमें उसे फिर से अमल में लाने की आवश्यकता है।

       आइए, आज 29 जुलाई को अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस पर हम बाघों के संरक्षण के प्रति सबको जागरूक करें और अपने राष्ट्रीय पशु बाघ एवं पर्यावरण के संरक्षण में अपना छोटा सा सार्थक सहयोग करें।  

सीमा शर्मा   

बाघ को बचाकर पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान करें। 

मंगलवार, 28 जुलाई 2020

उँगलियों के निशान की दास्तान

       हाथों की और मस्तक की रेखाओं के बारे में तो सबने अपने पूर्वजों से सुना होगा, लेकिन उँगलियों के निशानों के बारे में हमारे पूर्वजों ने भी नहीं सुना था। पहले अनपढ़ लोगों को अंगूठा छाप कहते थे, लेकिन अब तो बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोग, अफ़सर, डॉक्टर, अध्यापक, इंजीनियर, वकील, जज सभी अँगूठे या उँगली की एक छाप से ही पहचाने जाते हैं।

       दोस्तों! आज हम बात कर रहे हैं उँगलियों के निशान अर्थात् फिंगर प्रिंट्स की। क्या आप जानते हैं कि इनके बारे में सबसे पहले किसने जाना होगा? सबसे पहले इन्हें किसने पहचाना होगा? किसने इनके बारे में दुनिया को बताया होगा? आपका उत्तर शायद ना में होगा। कोई बात नहीं दोस्तों! मैं हूँ ना, आपको यह जानकारी देने के लिए। यूँ तो देखने में सभी के हाथों की उँगलियाँ एक जैसी ही दिखती हैं, लेकिन एक ही व्यक्ति की 10 उँगलियों के निशान भी एकदम अलग और भिन्न-भिन्न होते हैं। हमारे दस्तख़त या हस्तलिपि की नकल तो कोई भी कर सकता है, लेकिन किसी की भी उँगलियों के निशान की नकल करना पूर्णरूपेण असंभव होता है।

       उँगलियों के निशान की खोज विलियम जेम्स हर्शेल ने की थी। इनका जन्म 28 जुलाई 1858 को ब्रिटेन में हुआ था। हर्शेल की पारिवारिक पृष्ठभूमि खगोल वैज्ञानिकों से संबन्धित थी। वे ईस्ट इण्डिया कंपनी में कार्यरत थे। वर्ष 1800 में बंगाल में उनकी नियुक्ति की गई थी। उन्होने महसूस किया था कि प्रत्येक इंसान के हाथों की उँगलियों के निशान अलग-अलग होते हैं। इसका प्रयोग व्यक्तियों की पहचान के लिए किया जा सकता है। इन्होने अपनी इस सोच को साबित करके दुनिया के सामने रखा। आई सी एस पद पर रहते हुए उन्होने दस्तख़त के स्थान पर आधिकारिक तौर पर सर्वप्रथम अपनी उँगलियों के निशान का प्रयोग किया। इसके बाद जासूसी, पुलिस के कार्य, सुरक्षा संबंधी कार्यों में, कैदियों की पहचान आदि के लिए इनका प्रयोग कानूनी तौर पर होने लगा।

       वर्तमान की अगर बात करें तो आज दुनिया इस क्षेत्र में 2 नहीं 4 कदम आगे बढ़ गई है, और पता नहीं कितने और कदम बढ़ाने के लिए प्रयासरत है। आज हम अनेक जगहों पर उँगलियों के निशानों का प्रयोग करते हैं, जैसे- मतदान हेतु (जहाँ ईवीएम मशीन नहीं हो), आधार कार्ड बनाने हेतु, ऑफिस में उपस्थिति दर्ज करने हेतु आदि।

       है ना मजेदार! उँगलियों के निशान की दास्तान।

                                                                सीमा शर्मा 


       


सोमवार, 27 जुलाई 2020

मिसाइल मैन

देश को भ्रष्टाचार मुक्त और खूबसूरत बनाना हो तो तीन लोग अहम भूमिका निभाएंगे- माता, पिता और शिक्षक।

जी हाँ दोस्तों! हमारे देश के मिसाइल मैन कहे जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम जी का यही कहना था। आज चारों तरफ फैले भ्रष्टाचार को देखें तो कलाम साहब की बात शत-प्रतिशत सत्य प्रतीत होती है। कोई भी नागरिक सर्वप्रथम बच्चा ही होता है, और उसका सबसे पहला संबंध अपने माता-पिता से तत्पश्चात शिक्षक से होता है। यहाँ कलाम साहब के कहने का आशय है कि यदि बालक को जन्म से, घर से ही माता-पिता और उसके बाद विद्यालय मेन शिक्षक द्वारा सत्य-पथ पर चलने का मार्ग दिखाया जाए तो देश भ्रष्टाचार मुक्त और सुंदर ही बन जाएगा।

आज अब्दुल कलाम जी कि पाँचवी पुण्यतिथी पर इनको स्मरण करते हुए इनके जीवन के बारे में एवं इनके अतुलनीय भारतीय योगदान के बारे में चर्चा करते हैं-

कलाम साहब का जन्म 15 अक्तूबर 1931 को तमिलनाडु के रमानाथपुरम जिले के रामेश्वरम में मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। इंका पूरा नाम अबुल पाकिर जैनुल अब्दिन अब्दुल कलाम मसऊदी था। ये संयुक्त परिवार में रहते थे तथा 10 बहन-भाई थे। इनके पिता कम पढे-लिखे तथा निर्धन ही थे। लेकिन वे बहुत मेहनती और ईमानदार थे। इन पर अपने पिता का बहुत प्रभाव पड़ा था। उनके दिये संस्कारों ने ही उन्हें जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। बचपन में इनके एक शिक्षक की दी गई सीख का भी इन पर गहरा असर रहा। उन्होने कहा था कि “जीवन में सफलता तथा अनुकूल परिणाम प्राप्त करने के लिए तीव्र इच्छा, आस्था, अपेक्षा इन तीन शक्तियों को भलीभाँति समझ लेना और उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहिए।

बचपन में एकबार जब वे पाँचवी कक्षा में थे, तब उनके अध्यापक उन्हें पक्षियों के उड़ने का तरीका समझने के लिए समुद्र के किनारे पर ले गए थे, तभी उन्होने निश्चय कर लिया था कि उन्हें अन्तरिक्ष-वैज्ञानिक ही बनना है। 1950 में इन्होने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी से अन्तरिक्ष विज्ञान में स्नातक की डिग्री ली। 1962 में भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन में आने के बाद इन्होने सफलता पूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में अहम भूमिका निभाई। पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एस एल वी 3 के निर्माण में परियोजना निदेशक बने, जिससे जुलाई 1982 में रोहिणी उपग्रह का अन्तरिक्ष में सफलता पूर्वक प्रक्षेपण किया गया। इसरो लॉन्च व्हीकल प्रोग्राम को पंख लगाने का श्रेय भी इनको ही जाता है। इन्होने अग्नि एवं पृथ्वी जैसे प्रक्षेपात्रों को स्वदेशी तकनीक से बनाया।

कलाम साहब जुलाई 1992 से दिसंबर 1999 तक रक्षामंत्री के सलाहकार तथा सुरक्षा शोध और विकास विभाग के सचिव रहे थे। इन्हीं के निर्देशन में भारत ने 1998 में पोखरण में दूसरी बार परमाणु परीक्षण करके परमाणु हथियार के निर्माण की क्षमता प्राप्त की। ये भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे। 18 जुलाई 2002 को कलाम साहब 90 प्रतिशत बहुमत द्वारा राष्ट्रपति चुने गए। इंका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ था। राष्ट्रपति कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी वो अनेक शिक्षण संस्थानों, विश्व-विद्यालयों में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाते रहे थे। 27 जुलाई 2015 को वे भारतीय प्रबंधन संस्थान शिलोंग में रहने योग्य ग्रह पर एक व्याख्यान दे रहे थे, तभी उन्हें हार्ट-अटैक आया और 2 घंटे बाद इनकी मृत्यु की पुष्टि हो गई।

व्यक्तिगत जीवन में कलाम साहब बहुत ही अनुशासन प्रिय व्यक्ति थे। इन्होने अपनी पुस्तक विंग्स ऑफ फायर से कई युवाओं को मार्गदर्शन कराया। इनकी एक और पुस्तक है जो इनके आत्मिक विचारों को उद्धृत करती है –गाइडिंग सोल्स-डायलोग्स ऑफ द पर्पज ऑफ लाइफ। इन्होने तमिल भाषा में कविताएं भी लिखीं। ये भारत को अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में विश्व में चोटी पर देखना चाहते थे। ये विचार इन्होने अपनी पुस्तक इंडिया 2020 – ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम में लिखे हैं। इसके लिए इन्होने कार्य-योजना भी बना ली थी। माई जर्नी तथा इग्नाइटेड माइण्ड्स – अनलिशिंग द पावर विदिन इंडिया भी इनकी बहुत प्रसिद्ध पुस्तकें हैं।

कलाम साहब नित्य कर्नाटक भक्ति संगीत सुनते थे, और हिन्दू संस्कृति में उनका विश्वास था। वे कुरान और भगवद-गीता दोनों का ही अध्ययन करते थे। वे जीवन भर शाकाहारी रहे थे। 2011 में उन पर आई एम कलाम एक हिन्दी फिल्म भी बनी, जिसमें एक राजस्थानी बच्चा छोटू उनके सम्मान में अपना नाम कलाम रख लेता है। भारत सरकार द्वारा कलाम साहब को इनके महान कार्यों और विज्ञान के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए अनेक पुरस्कार भी प्रदान किए गए-

1.   पद्म भूषण - 1981

2.   पद्म विभूषण – 1990

3.   भारत रत्न – 1997

कलाम साहब की बातें तो इतनी है कि जीवन में अपनाते जाओ तो धरती स्वर्ग बन जाएगी। उनके ज्ञान के सागर में से मैं दो बूंदों के समान उनकी दो बातें आज कि नयी पीढ़ी के लिए दोहराना चाहूंगी। कलाम साहब कहते थे-

“सपने वो नहीं, जो आप सोते वक्त देखते हैं, सपने वो होते हैं, जो आपको सोने नहीं देते हैं।“

“जिस दिन हमारे सिग्नेचर ऑटोग्राफ में बदल जाएँ तो मान लीजिए कि आप कामयाब हो गए हैं।“

कलाम साहब के विचार आज भी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणादायक हैं।

सीमा शर्मा 


रविवार, 26 जुलाई 2020

कारगिल विजय दिवस

    कारगिल की लड़ाई को कोई नहीं भूल पाया होगा। कारगिल का नाम आते ही याद आता है अनेक शहीदों का बलिदान, कारगिल का नाम आते ही याद आती है भारत की विजय, कारगिल का नाम आते ही भारत के वीर शहीदो के नमन मे हर कोई नतमस्तक हो जाता है। जी हाँ दोस्तो ! आज 26 जुलाई 'कारगिल विजय दिवस' है। 60 दिनो तक भारत और पाकिस्तान के मध्य चले इस युद्ध का अंत आज ही के दिन 1999 में भारत की विजय के साथ हुआ था। तभी से आज के दिन को प्रतिवर्ष कारगिल विजय दिवस के रूप मे मनाया जाता है। इस विजय की कीमत 550 भारतीय जवानों ने अपना बलिदान देकर और लगभग 1400 जवानों ने घायल होकर चुकाई।
 
    पाकिस्तान और उसके घुसपैठियों ने जब छिपकर नियंत्रण रेखा को पार कर भारत में घुसने की कोशिश की और अपनी इस कुचेष्टा को ‘ऑपरेशन बद्र’ नाम दिया था, तब भारत ने 2 लाख जवानों के साथ ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। जिसका परिणाम आप सभी जानते ही है। नाम के अनुरूप ही ये ऑपरेशन विजय दिलाने वाला रहा। पाकिस्तान को एक बार फिर मुँह की खानी पड़ी और भारत ने अपनी जमीन पर पुनः कब्जा कर लिया, लेकिन इस सब की कीमत चुकाने में भारत की अनेक माताओं ने अपने सपूत बलिदान किए, वीरांगनाओं ने अपने शहीद पतियों को हँसते-हँसते अंतिम विदाई दी और अनेक मासूम नौनिहालों ने अपने सर से पिता का साया खो दिया। 

    सभी की आंखो में आँसू थे परन्तु सीना गर्व से चौड़ा था क्योंकि देश पर मिटने वाले कभी मरते नही है, वे तो अमर हो जाते है। सलाम है उन सभी अमर शहीदो की शहादत को, उनके परिवार, माता-पिता और पत्नी एवं बच्चों को जिन्होने अपने प्यार की डोर को उनकी कमजोरी बनकर बेड़ी का काम नहीं किया बल्कि उनमें साहस की भावना का संचार कर मातृ भूमि पर प्राण न्योछावर करने का संबल प्रदान किया। धन्य है भारत भूमि! जिस पर ऐसे देशभक्तों ने जन्म लिया। सभी शहीदों को बार-बार कोटि-कोटि नमन। 

            धन्य है भारत की मिट्टी, धन्य वो भारत माता है, 
            सरहद पर जिसका सपूत, हँसकर मर-मिट जाता है। 
            वीर-वधू और नौनिहाल भी, पत्थर का सीना रखते हैं, 
            आँख भरी हो आँसू से पर, गर्व शहीद पर करते हैं।
            

                                                                                                         सीमा शर्मा

जय हिन्द! जय भारत!! जय हिन्द की सेना!!!

शनिवार, 25 जुलाई 2020

नाग-पंचमी

    भारतीय संस्कृति वैदिक काल से ही प्रकृति एवं प्रकृति द्वारा निर्मित प्राणियों, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों से प्रेम करने वाली रही है। हमारे वेदों में अनेक देवी-देवताओं के रूप में प्रकृति ही दिखाई देती है। जैसे- सूर्य देवता, पृथ्वी देवी, वायु देव, वरुण देव, उषा, चंद्र, इन्द्र, अग्नि, जल, अन्न, प्रकृति आदि। इनके अतिरिक्त भी आर्य धर्म में अनेक पशु-पक्षी और पेड़-पौधों को भी देवता के रूप में पूजा जाता है। जैसे- गाय को माता के रूप में पूजा जाता है और गाय के शरीर में तो सभी देवी-देवताओं का वास भी माना गया है। बैल शिव की सवारी और किसान का साथी है। शेर को माँ दुर्गा की सवारी के रूप में, मोर को शिव पुत्र कार्तिकेय की सवारी के रूप में, हंस को विद्या कि देवी सरस्वती के वाहन के रूप में, हाथी को गणेश के रूप में, चूहे को गणेश की सवारी के रूप में, यहाँ तक कि बिल्ली को लक्ष्मी के रूप में और उल्लू को लक्ष्मी कि सवारी के रूप में, गरुड़ को विष्णु जी कि सवारी के रूप में, कौए को पितृ-पक्ष में पितरों के रूप में, कछुए को पृथ्वी का भार अपने ऊपर वहन करने के रूप में, कुत्ते और गधे को शीतला माता कि सवारी के रूप में पूजा जाता है।

    इसी तरह अनेक पेड़-पौधों की पूजा भी हमारे धर्म में की जाती है, जैसे- पीपल, बरगद, तुलसी, आंवला, आम, अशोक, नीम, खेजड़ी, धतूरा, आक, बेलपत्र, कमल, नारियल आदि। ये सब बताते हैं कि हमारा धर्म हमें प्रकृति से जोड़ता है। वास्तव में हमारा धर्म पूर्णतः वैज्ञानिक रूपेण है, जो हमें प्रकृति कि रक्षा करना सिखाता है। परंतु क्या साँप की पूजा के बारे में कोई सोच सकता है ? जी हाँ ! हिन्दू धर्म का यही तो अनूठापन है। कण-कण में ईश्वर को देखना, हर छोटे-बड़े प्राणी, जीव-जन्तु में उसी ईश्वर की आत्मा के वास को मानना। हमारे यहाँ नाग-देवता को भी पूजा जाता है।

    आज नाग-पंचमी का त्योहार है। श्रावण मास के शुक्ल-पक्ष की पंचमी को नाग-पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। श्रावण मास में पूरे महीने शिवजी की पूजा की जाती है और शिव तो सर्पों की माला ही पहनते हैं, तो शिव के साथ आज के दिन नाग की पूजा भी की जाती है। जिस तरह शिवजी को दूध से नहलाया जाता है, उसी प्रकार आज के दिन नाग को भी दुग्ध-स्नान कराया जाता है।

    बहुत से लोग सोचते हैं कि साँप तो जहरीले होते हैं, इनके काटने से मनुष्य की मृत्यु भी हो जाती है, इसलिए ये खतरनाक जन्तु है। अतः आज मैं कुछ तथ्य यहाँ बताना चाहूंगी कि प्रथम तो सभी साँप जहरीले नहीं होते हैं। संसार में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों में से  लगभग 10-15 प्रतिशत साँप ही जहरीले होते हैं। द्वितीय यह कि जब तक साँप को स्वयं पर खतरा महसूस नहीं होता है, वह सामने से व्यर्थ में कभी भी नहीं काटता है। वह जब भी काटता है, स्वरक्षा में काटता है, स्वयं को बचाने के लिए काटता है। जो एक सामान्य स्वभाव है, हमें या किसी भी प्राणी को खुद पर खतरा दिखाई दे तो सभी अपना उपयुक्त बचाव करते ही हैं।

    साँप हमें कुछ शिक्षाप्रद बातें भी बताते हैं। जैसे- साँप को सुगंध बहुत प्रिय होती है। वह चन्दन, चम्पा, केवड़े के वन और पेड़ों में रहना ज्यादा पसंद करता है। उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को भी सद्गुणों कि सुगंध, सुविचारों कि सुवास के मध्य रहना चाहिए। भारत कृषि प्रधान देश है। साँप खेतों और फसल की जीव-जन्तु, चूहों आदि से रक्षा करता है, इसलिए इसे क्षेत्रपाल अर्थात् खेत का रक्षक भी कहा गया है। हमें भी इसी तरह अपने अन्नदाता की रक्षा एवं सहायता करनी चाहिए। हमें जानना चाहिए कि सर्प अकारण नहीं काटता है। वर्षों से परिश्रम करके अपनी संचय की हुई शक्ति अर्थात् विष को वह यों ही किसी को काट कर व्यर्थ नष्ट नहीं करेगा। उसी प्रकार हमने भी तपस्या या परिश्रम से कोई वस्तु या शक्ति प्राप्त की हो तो उसे अकारण ही किसी पर क्रोध करके नष्ट नहीं करना चाहिए। बल्कि उसे हमें स्वयं के विकास करने में, असक्षम को सक्षम बनाने में, असहाय की सहायता करने में प्रयोग करना चाहिए।

    माना जाता है कि कुछ दैवीय सर्पों के मस्तक पर एक नागमणि भी होती है। वह अमूल्य वस्तु होती है। मणि को मस्तक पर धारण कर सर्प हमें यह शिक्षा देता है कि समाज में योग्य, विद्वान, गुरुजन, माता-पिता, अग्रज, गुणी लोगों का स्थान हमारे मस्तक पर होना चाहिए अर्थात् हमें उनका आदर-सम्मान कर उनकी बातों, वचनों, आज्ञा को शिरोधार्य करके पालन करना चाहिए। जिस तरह साँप बिल में एकांत में रहता है, उसी प्रकार प्रभु को प्राप्त करने के लिए मुक्ति का मार्ग भी जनसमूह से दूर रहते हुए एकांत में कड़ी तपस्या से ही होकर गुजरता है। जहाँ मनुष्य पूर्णरूपेण निर्बाध होकर ध्यान में लीन हो सकता है। समुद्र-मंथन के समय साधन रूप में वासुकी नाग का प्रयोग किया गया। इससे सबकी सहायता के लिए तत्पर रहने की शिक्षा भी हमें नाग द्वारा मिलती है।

    बारिश में साँप ज्यादा इसलिए दिखाई देते हैं, क्योंकि उनके घर अर्थात् बिलों में पानी भर जाता है। इसलिए वे सुरक्षित आश्रय की तलाश में होते हैं। जो एक सामान्य प्रक्रिया है। हमारे भी घरों में यदि पानी भरने लगता है तो हम भी सुरक्षित स्थान की तलाश में घर से बाहर निकलते ही हैं। तब कोई हमें मारने की कोशिश करे तो क्या वह सही है ? इसलिए करबद्ध निवेदन है कि अकारण साँप को नहीं मारें, जब तक आपको उससे खतरा नहीं हो तब तक उसे अपने सुरक्षित आश्रय-स्थल कि तरफ जाने दें।

    अष्ट नागों के माध्यम से कहा भी गया है कि-

        वासुकि: तक्षक: चैव कालियो मणिभद्रक:।

        ऐरावतो धृतराष्ट्र: कार्कोटक धनंजयो। ।

        एतेऽभयं प्रयच्छंति प्राणिनाम् प्राणजीविनाम्। (भविष्योत्तरपुराण - 32 – 2 - 7)

    अर्थात् वासुकि, तक्षक, कालिया, मणिभद्रक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, कार्कोटक और धनंजय ये अष्टनाग प्राणियों को अभय प्रदान करते है।

सीमा शर्मा


नाग-पंचमी की शुभकामनाएं

     

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

तीज का त्योहार

तीज का त्योहार अपने संग हरी-हरी चूड़ियाँ, लाल-लाल मेहंदी रचे हाथ, हरी चुनरी, घेवर वाली मिठाई, माँ गौरी की पूजा, मेले, झूले, तीज की सवारी आदि न जाने कितनी चीजें लेकर आता है। यह त्योहार हिंदी महीने के श्रावण के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथी को मनाया जाता है। सुहागनों और विशेषतः नवविवाहिताओं के लिए तो ये बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में यह मुख्यतः मनाया जाता है। नव विवाहिताओं के लिए मायके से चूड़ी, मेहंदी, कपडे, उपहार, घेवर वाली मिठाई आदि सामग्री भी ससुराल भेजी जाती है।

राजस्थान में तो इस त्योहार की बड़ी धूम रहती है। वहाँ बड़े-बड़े मेले लगते हैं, तीज माता की सवारी निकाली जाती है। तीज से मिलता-जुलता त्योहार यहाँ फाल्गुन माह में गणगौर के रूप में भी मनाया जाता है। इसमें भी गणगौर की बड़ी सवारी और मेले होते हैं। गणगौर और तीज दोनों ही माता पार्वती की प्रतीक हैं। माता पार्वती के समान अखंड सौभाग्यवती रहने का वरदान ही दोनों त्योहारों की समानता है।

कविता की कुछ पंक्तियों के माध्यम से तीज के त्योहार को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने का छोटा सा प्रयास कर रही हूँ -

तीज का त्योहार आया, खुशियों की बयार लाया।

झूलों पर पींग बढ़ा सखियों ने, सावन का गीत गाया।

 

चारों ओर हरियाली चादर, फैली हुई है भू पर।

मन मयूर नाच रहा है, पंख फैलाए झूम कर।

हरियाली का हरा रंग, सबके मन को खूब भाया।

तीज का त्योहार आया, खुशियों की बयार लाया।

 

सुहागन गौरी सज-संवर कर, पिया को रिझाने चली।

नवजीवन के स्वप्न सुन्दर, मन में सजाए मखमली।

देख पिया की छवि, गौरी का मुख-मंडल लजाया।

तीज का त्योहार आया, खुशियों की बयार लाया।

 

हरी-हरी चूड़ियों की खनक,  मनमोहक मेहंदी की महक।

रंग महावर का चटख, गौरी रही सब देख चहक।

चूड़ी, मेहंदी, घेवर संग, पीहर से है भाई आया।

तीज का त्योहार आया, खुशियों की बयार लाया।

 

मंगला गौरी से करे ये विनती, दीर्घायु हो जीवनसाथी।

जनम-जनम का साथ हमारा, ज्यों दीपक के संग बाती।

पिया का स्वरुप गौरी ने, मन के मंदिर में है बसाया।

तीज का त्योहार आया, खुशियों की बयार लाया।

 

                                                    सीमा शर्मा

Teej ka jhula


महा टीकाकरण अभियान (MEGA VACCINATION PROGRAMME)

  वैक्सीन लगवाओ ए दोस्तों , कोविड भगाओ ए दोस्तों। आगे आओ ए दोस्तों , भ्रम न फैलाओ ए दोस्तों।   वैक्सीन जो तुम लगवाओगे , कोरोना को त...