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मंगलवार, 30 जून 2020

सुपरमैन की कहानी

दोस्तों! बचपन में सभी ने कॉमिक्स ज़रूर पढ़ी होगी। कॉमिक्स के पीछे बचपन में सभी दीवाने होते थे। कहाँ-कहाँ से कैसे-कैसे भी जुगाड़ करके भी कॉमिक्स जरूर पढ़ते थे। कॉमिक्स के अनेक सुपर हीरो होते थे, जिनको कॉमिक्स पढ़ते समय हम स्वयं जीने लगते थे। कॉमिक्स की कहानियाँ पढ़ते समय उनमें इतना खो जाते थे कि लगता था वो कल्पना नहीं हकीकत है। कल्पना की उस उड़ान में हम अपने आपको भी कहीं न कहीं उसके पात्रों में समन्वित कर लेते थे।

    ऐसी ही काल्पनिक दुनिया के एक सुपर हीरो का नाम 'सुपरमैन' है। जी हाँ दोस्तों! आज हम दुनिया के सुपरमैन की बात कर रहे हैं। उसकी शक्तियाँ ऐसी थी कि कई बार व्यक्ति सोचता है कि उसके पास सुपरमैन की शक्तियाँ आ जाएँ तो वह पलक झपकते ही सब कुछ कर सकता है।

    सुपरमैन अमेरिकी कॉमिक्स बुक्स का महानायक है। इसके लेखक ज़ेरी सीगल एवं आर्टिस्ट जॉय शस्टर ने 30 जून 1938 को इसकी प्रथम कॉमिक्स 'एक्शन कॉमिक्स # 1' जारी की। अमेरिकी कॉमिक्स जगत में इसने ज़बरदस्त धूम मचा दी। समाचार-पत्र, रेडियो टेलीविज़न, फ़िल्मों और वीडियो गेम सभी जगह इसकी ही चर्चा, कहानी और ख़बरें आती थी। इसका प्रकाशन डी सी कॉमिक्स द्वारा किया गया।

    सुपरमैन की शक्तियाँ उसे सुपर बनाती थी। जैसे-चमत्कारी शक्तियाँ, तीव्र गति, घाव का अपनेआप भर जाना, सूक्ष्म ध्वनि श्रवणता, जमा देने वाली बर्फीली श्वांस, लम्बी आयु, गुरुत्वाकर्षण के विपरीत उड़ने की शक्ति, आर-पार देखने की शक्ति, एक्स रे विज़न, बुद्धिमत्ता आदि इन्हीं अनेक चमत्कारी शक्तियों के कारण ही यह सुपरमैन था।

    इसकी नीली रंग की पोशाक,  लाल लबादा और सीने पर लाल एवं पीले रंग का लिखा अंग्रेजी में एस (S) अक्षर के गढ़े शिल्ड वाला पहनावा भी इसे सुपर लुक देता है। आज भी बच्चे जब स्कूल में फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में सुपरमैन बनते हैं, तो यह उनकी पसंदीदा पोशाक होती है।

    सुपरमैन की उद्गम कथाओं में उसे ब्रह्माण्ड के किसी काल्पनिक ग्रह क्रिप्टॉन का अंतिम वासी कहा जाता है, जिसका वास्तविक नाम 'काल-एल' है। उसके वैज्ञानिक पिता 'ज़ोर-एल' ने उसे बचाने के लिए रॉकेट से पृथ्वी पर प्रक्षेपित कर दिया था, क्योंकि उनका ग्रह क्रिप्टॉन नष्ट होना शुरू हो जाता है।

    पृथ्वी पर उसे कैनसैस के कृषक परिवार द्वारा अपना लिया जाता है, और नाम दिया गया क्लार्क केंट। वे इसे नैतिक शिक्षा एवं आदर्श सीख का पाठ पढ़ाते हैं। धीरे-धीरे उसे अपनी सुपर शक्तियों का पता लगने लगता है और युवा होने पर वह गुप्त रूप से सुपरमैन के रूप में मानवता की भलाई का संकल्प लेता है।

    आज अगर सुपरमैन मुझे कहीं मिल जाए तो मैं उससे यही कहूँगी-

                        'सुपरमैन सुपरमैन, जल्दी से अब आ जाओ।

            आकर तुम दुनिया से, कोरोना को ले जाओ।'

                                                    सीमा शर्मा


Superman - Wikipedia


सोमवार, 29 जून 2020

आंकड़ों की भाषा के जादूगर-प्रो. पी.सी. महालनोबिस

हम सबको किसी भी चीज का सर्वे या जानकारी लेनी हो तो आंकड़े (Data) इकट्ठे करते हैं। आंकड़ों के माध्यम से आगे की योजना बना सकते हैं। किसी भी चीज को स्वयं अच्छे से समझ सकते हैं और दूसरों को भी समझा सकते हैं। आंकड़ों की भाषा को सांख्यिकी (Statistics) कहते हैं।

दोस्तों! आज हम यहाँ बात कर रहे है आंकड़ों के जादूगर प्रोफ़ेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस की। इनका आज 29 जून को 127 वाँ  जन्मदिन है। भारत में अनेक प्रसिद्ध वैज्ञानिक हुए हैं। उन्हीं में से एक महान वैज्ञानिक और सांख्यिकी संस्थान के संस्थापक प्रोफ़ेसर प्रशांत चंद्र महालनोबिस भी हुए हैं।

इनका जन्म 29 जून 1893 को हुआ था। ये पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के रहने वाले थे। कोलकाता से शिक्षा ग्रहण करने के बाद ये आगे की पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ़ लन्दन गए थे। इनका सांख्यिकी ज्ञान वहाँ की प्रसिद्ध पत्रिका बायोमेट्रिका से हुआ। इसके लेखों को ये बड़े ध्यान से पढ़ते थे।

इनका भारतीय सांख्यिकी क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान रहा है।  लन्दन से आने के बाद इन्होने 1931 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान(Indian Statistical Institute) की स्थापना की। सांख्यिकी क्षेत्र के योगदान में इनका प्रथम प्रयास मानवमिति अर्थात् मानव शास्त्रीय आंकड़ों का विश्लेषण था। 1955 - 1967 तक वे स्वतंत्र भारत के पहले योजना आयोग(Planning Commission) के सदस्य भी रहे थे।

इनके तीन कार्य जिनका सांख्यिकी क्षेत्र में बहुत योगदान और महत्व है। वे निम्नलिखित हैं -

1. मानवशास्त्रीय सर्वेक्षण (Human Classical Survey)

2. बड़े पैमाने पर नमूना सर्वेक्षण (Sample Survey)

3. फ्रैकटाइल चित्रात्मक विश्लेषण (Fractile Graphical Analysis)

इनके सांख्यिकी के महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए 2007 में केंद्र सरकार ने इनके सम्मान में 29 जून को इनके  जन्मदिवस को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की। सामाजिक - आर्थिक नियोजन और नीति तैयार करने में, सांख्यिकी के महत्व के बारे में जान जागरूकता पैदा करने के लिए भारत में प्रत्येक वर्ष 29 जून को राष्ट्रीय सांख्यिकी दिवस मनाया जाता है। इस दिन को प्रत्येक वर्ष एक थीम भी दी जाती है। इस वर्ष की थीम है उत्तम स्वास्थ्य और खुशहाली एवं लैंगिक समानता’ (Good Health and well being and Gender Equality)। इस दिन राष्ट्रीय विकास में सरकारी सांख्यिकी को उजागर करने के लिए देशभर के कार्यालयों, कॉलेजों आदि में संगोष्ठियों, चर्चाओं, व्याख्यानमालाओं, वाद-विवाद प्रतियोगिताओं आदि का आयोजन भी किया जाता है।

                                                                सीमा शर्मा


Statistics Day was celebrated on june 29, 2019 on the birth ...


रविवार, 28 जून 2020

वर्साय के संधि पत्र पर हस्ताक्षर

    संधि अर्थात् जोड़। सामान्य शब्दों में संधि का यही अर्थ होता है। परन्तु गहराई में जाएँ तो इसके अनेक अर्थ होते हैं, जैसे शरीर में विभिन्न हड्डियों के जोड़, भाषा के व्याकरण का एक भाग या अध्याय, दो या दो से अधिक लोगों, समूहों या देशों के बीच किसी बात का समझौता होना, किसी अनंत युद्ध को समाप्त करने के लिए कुछ शर्तों के साथ एक समझौता या एक पक्ष का आत्मसमर्पण आदि।

    यहाँ हम जिस ऐतिहासिक विशिष्ट घटना की बात कर रहे हैं, वह है - वर्साय की संधि। इतिहास के विद्यार्थियों ने तो इसे विस्तार रूप से पढ़ा ही होगा। प्रथम विश्व युद्ध का नाम भी सभी ने सुना ही है। यह 1914 - 1919 के इतिहास की ऐसी घटना थी जिसमें एक-एक करके विश्व के 37 देश कूद पड़े थे। धीरे-धीरे यह एक ऐसे युद्ध में परिवर्तित हो गया जिसे दुनिया प्रथम विश्व युद्ध के रूप में जानती है। प्रथम विश्व युद्ध ऐसे युद्ध में बदलता जा रहा था, जो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अंत में जर्मनी ने कुछ शर्तों के साथ आत्म समर्पण किया और फिर 28  जून 1919 को वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर के साथ ही इसका अंत माना जाता है।

    परन्तु क्या वर्साय की संधि वास्तव में प्रथम विश्व युद्ध का अंत थी या यह द्वितीय विश्व युद्ध का बीजारोपण थी ? अनेक समीक्षकों और इतिहासकारों का भी यही मानना है कि वर्साय की संधि प्रथम विश्व युद्ध के अंत पर नहीं बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के जन्म की भूमिका पर हस्ताक्षर थी। ऐसा मानने के अनेक कारण हैं। आप इतिहास के पन्ने पलट कर देखेंगे तो प्रथम विश्व युद्ध एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई थी। अपनी शक्तियों, सीमाओं और उपनिवेशों को हर बड़ा देश बढ़ाना चाह रहा था, परन्तु किसी दूसरे का विस्तार सभी को नागवार लग रहा था। जर्मनी अपनी सैन्य शक्तियों को बढ़ाते हुए दिनोंदिन अपने उपनिवेशों की संख्या भी बढ़ाता जा रहा था। यह बात उस समय के बड़े राष्ट्र इंग्लैंड, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और फ़्रांस को खटकने लगी। इन्होने जर्मनी के विस्तार को रोकने के लिए आपस में मिलकर मित्र राष्ट्रों का समूह बने और जर्मनी को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया। इस तरह वर्साय की संधि का जन्म हुआ। इतिहास में यह संधि एक विवादित संधि के नाम से जानी जाती है।

    यह एक ऐसी संधि थी जिसने एक बड़े और शक्तिशाली राष्ट्र को हर तरह से पंगु बना दिया था। जर्मनी जैसा देश उसे ज्यादा समय तक ढ़ो नहीं सकता था। अंत में हुआ भी वही जिसका अंदेशा था।चांसलर एडोल्फ़ हिटलर की उत्पत्ति और द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारम्भ दोनों का गर्भस्थल वर्साय की संधि ही साबित हुआ।

    आप इतिहास के पृष्ठ पलट कर देखेंगे तो पाएंगे कि मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को इस संधि पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर दिया था। संधि का अर्थ होता है दोनों पक्षों में सहमति व समझौता।  लेकिन यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। इसमें मित्र राष्ट्रों की मनमर्जी से बहुत सी शर्ते और प्रतिबंधों का एक मसौदा बनाकर जर्मनी को हस्ताक्षर करने के लिए विवश कर दिया गया। हस्ताक्षर नहीं करने का अर्थ था कि  सभी मित्र राष्ट्र मिलकर फिर से जर्मनी पर आक्रमण कर देंगे, जो उस समय जर्मनी झेलने की स्थिति में नहीं था।

    वर्साय की संधि अनेक अर्थों में ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष है। जैसा कि पूर्व में बताया गया है कि यह प्रथम विश्व युद्ध के अंत के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का बीज भी थी। इसके अलावा  एक और विशेष घटना के लिए भी यह प्रसिद्ध है , जो उस समय हुई थी। वह महत्वपूर्ण घटना थी-राष्ट्रसंघ का निर्माण एवं संगठन। वर्साय संधि की प्रथम 26 धाराएँ राष्ट्रसंघ का संविधान ही हैं, जिनका मकसद अंतर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा एवं सहयोग को बनाये रखना था।

    परन्तु मित्र राष्ट्रों द्वारा जर्मनी को प्रथम विश्व युद्ध के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराते हुए उसकी बहुत सी भूमि छीन ली गयी, युद्ध की समस्त आर्थिक क्षति-पूर्ति उस पर लाद दी गई, उसकी सीमायें सीमित कर दी गई, सैन्य शक्ति बढ़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इतना सब कुछ होना राष्ट्र संघ के निर्माण के उद्देश्य के भी विरूद्ध ही था, तो यह शांति कितने दिन चलने वाली थी?

    अंत में वर्साय की संधि के दुष्परिणाम के रूप में इसके ठीक 20 वर्ष, 2 महीने और 4 दिन पश्चात् अर्थात् 1 सितम्बर 1939  को द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारम्भ जर्मनी के चांसलर एडोल्फ हिटलर द्वारा नाज़ी सेना को पौलैंड पर आक्रमण के आदेश के साथ हुआ।

                                                        सीमा शर्मा

RSTV Vishesh - 28 June 2019: World War I - Treaty of Versailles ...



शनिवार, 27 जून 2020

'वन्दे मातरम्' के वंदनीय कवि-बंकिम चंद्र चटर्जी


    वन्दे मातरम्, सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,

       शस्यश्यामलां मातरम्, वन्दे मातरम्।

दोस्तों! यह गीत तो सभी ने सुना, गाया, पढ़ा और देखा अवश्य होगा। यह हमारा राष्ट्रगीत 'वन्दे मातरम्' है। क्या आप जानते हैं यह गीत किसने लिखा? यह गीत बांग्ला कवि, लेखक, पत्रकार और साहित्यकार बंकिम चंद्र चटर्जी/चट्टोपाध्याय द्वारा लिखा गया है।

आइए, आज हम बंकिम चंद्र चटर्जी के बारे में बात करते हैं। इनका जन्म २७ जून, १८३८ को बंगाल के उत्तरी २४ परगना के कंठालपाड़ा के नैहाटी में हुआ था। इनकी शिक्षा हुगली और प्रेसीडेंसी कॉलेज से हुई थी। प्रेसीडेंसी कॉलेज से १८५७ में स्नातक की उपाधि लेने वाले ये पहले भारतीय थे।

बांग्ला साहित्य को इनकी बड़ी देन है। इन्होने बांग्ला साहित्य को बहुत समृद्ध किया। इनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं-दुर्गेश नंदिनी, कपाल कुंडला, विषवृक्ष, कृष्णकांतेर दफ्तर, आनंदमठ, मृणालिनी, इंदिरा, राधारानी, देवी चौधरानी, मोचीराम गौरेर जीवनचरित, ललित ओ मानस (कविता संग्रह) आदि। इसके अलावा इन्होने मासिक पत्रिका-बंगदर्शन का भी प्रकाशन किया था। बांग्ला साहित्य के उत्थान में इन्होने अग्रणी भूमिका निभाई। ये अंग्रेजी और बांग्ला भाषा में लिखते थे। इनकी अधिकांशतः रचनाओं का हिंदी के साथ-साथ अनेक भाषाओँ में भी अनुवाद किया गया है।

इनका सबसे बड़ा योगदान तो हमारे देश को 'वन्दे मातरम्-राष्ट्रगीत'  है। यह गीत इनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ में भी प्रयोग हुआ है। मूलतः यह गीत संस्कृत में ही लिखा गया है। इसकी धुन का कार्य यदुनाथ भट्टाचार्य ने किया था। इसे गाने में लगने वाला समय 1 मिनट और 5 सैकेंड है। संस्कृत शब्द वन्दे मातरम् का हिंदी में अर्थ 'माता की वंदना करता हूँ' होता है। अरविन्द घोष ने इस गीत का अंग्रेजी गद्य-पद्य में अनुवाद किया।   

बंकिम चंद्र चटर्जी ने इस गीत की रचना १८७६ में ब्रिटिश शासकों के सरकारी समारोहों में अनिवार्य रूप से गाए जाने वाले गीत 'गॉड! सेव द क्वीन' से आहत होकर भारत माता की वंदना के रूप में की थी । प्रारम्भ में इसके २ ही पद रचे गए थे, जो शुद्ध रूप से संस्कृत भाषा में ही थे। १८८२ में जब इन्होने 'आनंदमठ'  नामक उपन्यास लिखा तो देशभक्ति से परिपूर्ण यह गीत भी इसमें शामिल कर लिया। यह उपन्यास उस समय के सन्यासी विद्रोह पर आधारित था। इसमें यह गीत भी भवानन्द नामक साधु द्वारा गाया जाता है। इसलिए प्रारम्भ के २ पदों के बाद के सभी पद बांग्ला भाषा में ही हैं, जो उपन्यास के लिए ही रचे गए थे। प्रारम्भ के दो पदों में जहां संस्कृत में भारत माँ की वंदना की गयी है , वहीं बाद के सभी पदों में बांग्ला में माँ दुर्गा की स्तुति की गई है।

इतिहास साक्षी है कि इस गीत का राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में जोश भरने में अहम किरदार रहा था। आजादी के बाद आज भी यह गीत भारत के जन-मानस पर राष्ट्रगीत के रूप में आज भी देशभक्ति की भावना भरने में उतना ही सक्षम है, जितना आजादी से पहले था।

वंदनीय 'बंकिम चंद्र चटर्जी' को, नमन हम करते हैं।

भारत के जन-मानस में जो, 'वन्दे-मातरम्' भरते हैं।

                                        सीमा शर्मा

Essay on Bankim Chandra Chattopadhyay for Students & Children's – Ctet
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शुक्रवार, 26 जून 2020

नशा करे दुर्दशा

नशे ने कितनों को लूटा, तोड़ा और नष्ट किया।

अच्छे-अच्छे ज्ञानियों को भी, इसने पथभ्रष्ट किया।

पहला नशा-पहला खुमार...,नशे सी चढ़ गई ओय..., जादू है नशा है..., चार बोतल वोदका... ऐसे जाने कितने ही गाने नशे और शराब पर बने हैं। ये गाने सुनने में भले ही कुछ लोगों को पसंद आते हों, पर कोई भी यह नहीं चाहता होगा कि उनके घर में कोई शराबी रहे। यहाँ तक कि जो आदमी स्वयं शराब या किसी भी अन्य तरह का नशा करता हो, वो भी यह नहीं चाहेगा कि मेरी संतान नशे की गिरफ़्त में आए।

दोस्तों! नशा केवल शराब का ही नहीं होता है। इसमें सभी तरह का धूम्रपान, गुटखा-तम्बाकू, डोडा-पोस्त, अफीम-गांजा, चरस, ड्रग्स, स्मैक, हेरोइन, इसके अलावा कोई भी बुरी लत हो, वह भी एक नशा ही है। जैसे जुआ, लॉटरी टिकट आदि। नशे के कुछ और भी प्रकार हैं, स्कूल-कॉलेज जाने वाले कुछ विद्यार्थी चॉक, स्याही, व्हाईटनर आदि भी नशे के रूप में लेते हैं। इसलिए स्कूलों में व्हाईटनर के प्रयोग और कुछ हद तक बाजार में भी इसे बेचने पर रोक लगाई गई है।

नशा करने वाला व्यक्ति शुरू-शुरू में इसे शौकिया तौर पर या दोस्तों की देखादेखी करता है, परन्तु फिर वह इसका आदी हो जाता है। इसके बाद वह घर-गृहस्थी व अपनी सुध-बुध खोने लगता है। उसे बस नशे के अलावा कुछ भी दिखाई नहीं देता है। नशा करने वाला व्यक्ति अपना तो आर्थिक, मानसिक व शारीरिक नुकसान करता ही है, साथ ही साथ उसका सम्बन्ध पारिवारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्तों से भी टूटने लगता है।

हमारे देश में बहुत लोग अनेक प्रकार का नशा करते हैं। कुछ सीमित मात्रा में करते हैं, पर कुछ अत्यधिक मात्रा में करते हैं। ऐसे लोगों का रोज किसी न किसी से झगड़ा व मारपीट होती है। पुलिस-स्टेशन के चक्कर लगते रहते हैं। कभी-कभी तो ये नालों और सड़कों पर बेसुध पड़े रहते हैं। कुछ लोग बड़े-बड़े अपराधों में भी लिप्त हो जाते हैं। जिनके बारे में हम रोज अख़बारों में या टीवी न्यूज़ में देखते व पढ़ते ही हैं।

कुछ लोग किसी कारण से तनाव या चिंता में होते हैं और नशा करना शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि इससे उनकी चिन्ताएँ कम होंगी। परन्तु यह उनकी गलतफहमी होती है। ऐसे लोग कई बार अपना जीवन ख़त्म कर लेते हैं और कुछ लोग तो अपने परिवार के सदस्यों तक की जान भी ले लेते हैं।

दोस्तों! आइए आज हम २६ जून अन्तर्राष्ट्रीय नशा निरोधक दिवस पर ये प्रतिज्ञा करें कि हमें इस बीमारी से स्वयं भी दूर रहना है और अपनों को भी दूर रखना है। वैसे तो नशे से मुक्ति के लिए सरकार ने भी नशा मुक्ति केंद्र बना रखे हैं। जहाँ नशे के आदी हो चुके मरीजों का ईलाज किया जाता है। परन्तु यह भी एक विडम्बना ही है कि एक तरफ सरकार ने नशा मुक्ति केंद्र खोले हैं और दूसरी तरफ शराब के कारोबारियों और दुकानदारों को लाइसेंस भी सरकार ही देती है।

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सरकार हमारे देश से सभी नशीली वस्तुओं को ही समाप्त कर दे। इनको खरीदना-बेचना-सेवन करना अपराध की श्रेणी में कर दे। हमारे देश में इसे पूर्णरूपेण प्रतिबंधित कर दिया जाए। कमाई करने के इससे अच्छे और स्वस्थ विकल्प ढूंढे जा सकते हैं। दोस्तों! इस पर सोचिएगा जरूर।

नशा ये नशीला है, समाज का है ये दुश्मन।

गर ठान लो दूर रहना, सुन्दर बन जाएगा जीवन।

                                                                सीमा शर्मा

नशा मुक्त भारत अभियान औरंगाबाद ...


गुरुवार, 25 जून 2020

भारत के स्वदेशी विमान

मारुत सा तूफ़ानी, पाक के छक्के छुड़ाकर,

सारस सी उड़ान भरकर, तेजस सा तेजस्वी।

भारत के लड़ाकू विमान, नहीं हैं किसी से कम,

देश मेरा ये अजर-अमर, युग-युगांतर से ओजस्वी।

दोस्तों ! आपने लड़ाकू विमानों के बारे में तो सुना -पढ़ा होगा। आज हर देश की ताकत उसकी सैन्य शक्ति, अणु-परमाणु बम, लड़ाकू विमानों से आँकी जाती है। हमारा देश भी इस दिशा में दिनों-दिन सबल और सुदृढ़ स्थिति बनाता जा रहा है। आज हमारे देश की सैन्य ताकत और लड़ाकू साधनों की क्षमता किसी भी देश को हम पर धौंस ज़माने या हावी होने से रोकने में सक्षम है। आज हम यहाँ  भारत के स्वदेशी विमानों के बारे में बात करते हैं। भारत में इनका निर्माण अधिकांशतः हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड कम्पनी करती है। क्या आप जानते है भारत का पहला स्वदेशी विमान कौनसा था? आइए हम आपको बताते हैं- 

मारुत-

भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान था 'एच.एफ.-24 मारुत' सुपरसोनिक लड़ाकू विमान। इसमें 'एच.एफ.' का अर्थ था-हिंदुस्तान फाइटर। आँधी जैसी रफ़्तार की कल्पना करते हुए इसे 'मारुत' नाम दिया गया था। इस विमान ने जून 1961 में पहली बार उड़ान भरी थी। मारुत ने 1961-1990 तक सेवाएँ दी थी। 1971 के भारत-पाक युद्ध में मारुत ने बहुत कारनामे किए और पाक के छक्के छुड़ा दिए थे। मारुत विमान के अवशेष अभी भी दुनिया में दो जगह रखे गए हैं। एक बैंगलुरु के हेरिटेज कॉम्प्लेक्स में और दूसरा म्यूनिख़ के म्यूजियम में।

तेजस-

तेजस भारत द्वारा निर्मित हल्का बहुद्देशीय युद्धक विमान है। इसका निर्माण 1980 के दशक में प्रारम्भ हुआ था। इसे आधिकारिक तेजस नाम उस समय के प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 4 मई 2003 को दिया गया था। इसने पहली उड़ान 4 जनवरी 2001 को भरी थी।1 जुलाई 2016 में इसे सेना में शामिल किया गया। यह विमान पुराने मिग- 21 विमान की जगह लेगा।

 

सारस-

सारस भी भारत में निर्मित हल्का परिवहन विमान है। पहले इसकी शुरुआत रूस के सहयोग से 1991 में होने वाली थी, परन्तु बाद में रूस के बिना ही यह परियोजना २४ सितम्बर 1999 को मंज़ूर हुई। इसने पहली उड़ान 29 मई 2004 को भरी थी। किन्हीं कारणों से 2016 में इसके कार्य को रोक दिया गया था, परन्तु 2017 से इस पर पुनः कार्य चल रहा है।

इसके अलावा भी भारत द्वारा विदेशी कंपनियों के सहयोग से ट्रेनर, हॉक और टोही विमान बनाए गए। 1968 में एग्रीकल्चर विमान बसंत को डिज़ाइन किया गया। इसने 3 मार्च 1972 में पहली उड़ान भरी। 60 के दशक में एक कृषक विमान बनाया गया। इनके अलावा कुछ ट्रेनिंग विमान भी हैं, जो ट्रेनिंग देने के काम आते हैं। इनके नाम हैं- दीपक, किरण, सितारा आदि।

उम्मीद है भारत इस दिशा में आने वाले समय में और भी अच्छा कार्य करते हुए आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करेगा।

दुश्मन अब सतर्क रहे , हुंकार रहा है हिंदुस्तान।

रण में भारतीय विमान, बिखेरेंगे अपनी शान।

                                                            सीमा शर्मा

Tejas Plane Flights 26 January - बीकानेर के नाल से ...

मंगलवार, 23 जून 2020

इंटरनेशनल ओलम्पिक दिवस

खेलों के लिए आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज खेलों का महाकुम्भ कहे जाने वाले ओलम्पिक खेलों का उत्सव मनाने का दिन है। जी हाँ! आज इंटरनेशनल ओलम्पिक डे है। ओलम्पिक विश्वस्तरीय खेल प्रतियोगिता का एक बहुत बड़ा मंच है। सभी देशो के अनेक खेलों को एक साथ खेलने व देखने का अवसर ओलम्पिक खेल प्रतियोगिता में ही मिलता है।

यह क्रीड़ोत्सव आज के दिन दुनियाभर में बहुत उमंग व उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह उत्सव खेल और स्वास्थ्य से सम्बंधित है, इसलिए खेलिए और स्वस्थ रहिए। इस दिन दुनिया के सभी भागों में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। सभी देशों के अनेक खिलाड़ी इन आयोजनों का हिस्सा बनते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की स्थापना २३ जून १८९४ में सोरबोन, पेरिस में हुई थी, परन्तु पहली बार ओलम्पिक दिवस २३ जून १९४८ को मनाया गया था। तब से प्रत्येक वर्ष २३ जून को इसे मनाया जाता है। पहली बार आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन ग्रीस की राजधानी एथेंस में वर्ष १८९६ में हुआ था। इनका आयोजन प्रत्येक ४ वर्षों के अंतराल पर अलग-अलग देशों में किया जाता है।

आज के इस उत्सव में विश्व के किसी भी देश से कोई भी भाग ले सकता है। इसमें भाग लेने के लिए खिलाड़ी या ओलम्पियन होना आवश्यक नहीं है। आपका कोई पसंदीदा खेल, खिलाड़ी या देश हो तो भी आप उसका उत्साहवर्धन करने के लिए भी इसमें भाग ले सकते हैं।

वैसे तो प्रत्येक वर्ष इसे बहुत बड़े उत्सव के रूप में कई देशों में मनाया जाता है, परन्तु इस बार कोरोना महामारी के कारण इसे सभी देशों में डिजिटल प्लेटफार्म पर ही मनाया जा रहा है। सभी देश और बड़े-बड़े खिलाड़ी ऑनलाइन वर्कआउट करते हुए अपने वीडियो और फ़ोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करेंगे। अगर आप भी इनके फैन हैं तो आप भी ऑनलाइन वर्कआउट करते हुए सोशल मीडिया के माध्यम से ही उसमें भाग ले सकते हैं।

ओलम्पिक खेल समिति के तीन आधार स्तम्भ हैं-'आगे बढ़ो', 'सीखो' और 'खोजो' अनेक देशों ने तो इन स्तम्भों को स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल कर लिया है। हमारे देश की तरफ से इस बार ओलम्पिक २०१६ की एकल बैडमिंटन प्रतियोगिता की रजत पदक विजेता पी.वी.सिंधू ऑनलाइन भाग लेंगी।

                                                                सीमा शर्मा

International Olympic Day 2020: Know why we celebrate this day on ...

महा टीकाकरण अभियान (MEGA VACCINATION PROGRAMME)

  वैक्सीन लगवाओ ए दोस्तों , कोविड भगाओ ए दोस्तों। आगे आओ ए दोस्तों , भ्रम न फैलाओ ए दोस्तों।   वैक्सीन जो तुम लगवाओगे , कोरोना को त...