आज 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस है। शिक्षा और साक्षरता पर जितनी भी बातें की जाएँ, कम हैं। यह एक ऐसा विषय है जिस पर आज से पहले भी बहुत सारी चर्चा हो चुकी है। हर बार इन चर्चाओं में शिक्षा की नई आवश्यकताएँ, नई तकनीक, नई विधियाँ बहुत ही रोचक तरीके से सामने आती रही हैं। विश्व साक्षरता दिवस की शुरुआत कब, कैसे हुई एवं इसके उद्देश्य क्या हैं, यह जान लेना भी अति आवश्यक है। युनेस्को द्वारा 17 नवंबर 1965 में 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया गया। पहली बार इसे 8 सितंबर 1966 में मनाया गया। वर्ष 2009-10 में संयुक्त राष्ट्र दशक घोषित किया गया। तब से सम्पूर्ण विश्व में 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य समाज में लोगों का शिक्षा को प्राथमिकता और बढ़ावा देना और दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करना है।
संयुक्त राष्ट्र की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में लगभग
4 अरब लोग शिक्षित हैं, इसके बावजूद भी 1 अरब लोग अशिक्षित हैं। 2018 की गणना
के अनुसार 5 में से 1 व्यक्ति निरक्षर है, और अब विश्व की जनसंख्या 7.7 अरब हो चुकी है। भारत
के परिपेक्ष्य में बात करें तो भारत अभी पूर्ण साक्षरता से दूर है। भारत का साक्षरता
प्रतिशत वैश्विक स्तर के 75% से काफी नीचे है। भारत में साक्षरता को बढ़ावा देने की
आवश्यकता है, इसमें भी महिलाओं का साक्षरता स्तर और भी कम है। भारत
में पूर्ण साक्षरता वाला राज्य केरल है, यह बहुत अच्छी खबर है। साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना
ही नहीं है, अपितु अपने कर्तव्यों और अधिकारों को जानकर सामाजिक
विकास में योगदान देना है। गरीबी, असमानता आदि समस्याएँ भी तभी समाप्त हो सकती हैं।
इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण शिक्षा पर और भी घनी काली छाया मँडराने
लगी है। इस बार की साक्षरता दिवस की थीम है- ‘साक्षरता शिक्षण और कोविड-19: संकट और उसके बाद।’ इस वर्ष इस अवसर पर ‘शिक्षकों की भूमिका और बदली शिक्षा पद्धति’ पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसी के तहत सभी सरकारें और शिक्षक इस बार
ऑनलाइन शिक्षा पर ही ज़ोर ड़े रहे हैं और तकनीक के माध्यम से शिक्षा प्राप्ति के लक्ष्य
को पूरा करने का सफल प्रयास कर रहे हैं।
शिक्षा के महत्त्व को बताते संस्कृत में भी श्लोक हैं-
1. माता शत्रु: पिता वैरी येन बालो न पाठित:।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥
अर्थात् जो अपने
बालक को पढ़ाते नहीं, ऐसी माता शत्रु समान और पिता वैरी है,
क्योंकि जिस तरह हंसों के बीच बगुले के शोभा नहीं होती,
वैसे ही अनपढ़ मनुष्य भी विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते। अत: सभी मनुष्यों को
अपनी संतान को शिक्षा जरूर दिलवानी चाहिए।
2. रूपयौवन संपन्ना विशाल कुल संभवा:।
विद्याहीना
न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुका:॥
अर्थात् रूप सम्पन्न,
यौवन सम्पन्न और चाहे विशाल कुल में पैदा क्यों न हुए हों,
पर जो विद्याहीन हों, तो वे सुगंध रहित केशुड़े के पुष्प की भांति शोभा नहीं
देते।
3. विद्या ददाति विनयम् विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद्
धनमाप्नोति धनाद् धर्मं तत: सुखम्॥
अर्थात् विद्या
से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता,
योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है,
अत: सभी सुखों की प्राप्ति के लिए विद्या प्राप्ति अत्यावश्यक है।


Bahut hi acha likha hai bhabhi ji aapne
जवाब देंहटाएंDhanyawad
हटाएंप्राचीन काल में शिक्षा एवं विद्या संस्कार युक्त होती थी किंतु वर्तमान में शिक्षा एवं साक्षरता तो है किंतु संस्कारप्रधान नहीं है जो गुरुकुल में ऋषिकुलो में आचार्यों के द्वारा दी जाती थी । मैकाले पद्धति के इस साक्षरता दिवस में सभी शिक्षक एवं विद्यार्थियों को प्रयत्न करके समाज में संस्कारों का महत्व बढ़े इस हेतु भी यह आलेख सबको प्रेरणा दे रहा है इस हेतु आभार।
जवाब देंहटाएंसत्य कहा है आपने, धन्यवाद🙏
हटाएंसाक्षरता के क्षेत्र में भारत को अभी और काम करना होगा। इतनी युवा जनसंख्या अगर पूर्ण रूप से साक्षर हो तो भारत सब कुछ हासिल कर सकता है।
जवाब देंहटाएंहां, इसी जागरूकता के लिए लेख पाठकों को समर्पित किया है।
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