दोस्तों ! कारगिल का युद्ध तो आप सभी को याद ही होगा ! जब हर गाँव से कई-कई वीरों ने एकसाथ देश के लिए जान की बाजी लगा दी थी। हर घर का बच्चा-बच्चा देशभक्ति के जोशीले गीत गाकर, देशप्रेम के ही नारे लगा रहा था। हर बच्चा सेना में जाने का ही सपना देखने लगा था। उन अनेकों वीरों में से एक बहादुर व साहसी देशभक्त थे – कैप्टन विक्रम बत्रा। जिन्हें इनकी वीरता एवं साहस के कारण ‘कारगिल का शेर’ कहा जाने लगा। भारत सरकार द्वारा इन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया।
विक्रम का जन्म 9 सितंबर,
1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। इनकी माताजी का नाम श्रीमति कमलकान्ता
बत्रा एवं पिताजी का नाम श्री जी.एल. बत्रा था। इन्हीं के साथ इनके जुड़वाँ भाई विशाल
का भी जन्म हुआ था। इनकी माताजी ‘श्रीरामचरितमानस’ से बहुत प्रभावित थीं,
इसलिए उन्होने इनका नाम ‘लव’ और इनके जुड़वाँ भाई विशाल का नाम ‘कुश’
रखा था। इनकी दो बड़ी बहनें भी हैं। इन्होने प्रारम्भिक शिक्षा पालमपुर के ही डी.ए.वी.
और सेंट्रल स्कूल से प्राप्त की। ये पढ़ने में बहुत होशियार थे और इसके साथ-साथ टेबल-टेनिस
के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। स्कूल के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर
हिस्सा लेते थे। सेना छावनी के स्कूल अनुशासन और पिता द्वारा देशप्रेम की कहानियों
के प्रभाव से इनमें बचपन से ही देशभक्ति की प्रबल भावना थी। इसके बाद इन्होने डी.ए.वी.
कॉलेज, चंडीगढ़ से विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई की। कॉलेज में इन्हें
एन.सी.सी. का सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुना गया और इन्होने गणतन्त्र
दिवस की परेड में भी हिस्सा लिया।
इसके बाद 'संयुक्त रक्षा सेवा
परीक्षा' (सी.डी.एस.) की तैयारी करते हुए इनका हांगकांग में मर्चेन्ट नेवी में भी चुनाव
हो गया था परंतु इन्हें तो सेना में जाना था इसलिए इन्होने उसे ठुकरा दिया था। इसके
बाद इनका सी.डी.एस. में चयन हो गया और भारतीय सैन्य अकादमी देहारादून में प्रशिक्षण
समाप्त होने के बाद 6 दिसंबर, 1997
को जम्मू के सोपोर सेना की ’13 जम्मू-कश्मीर
राइफल्स’ में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। जून 1999 में कारगिल युद्ध
में 'हम्प' व 'राकी नाब' स्थानों को जीतने के बाद उन्हें कैप्टन पद दिया गया।
कैप्टन बनने के बाद इन्हें 'श्रीनगर-लेह-मार्ग' के ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण '5140 चोटी' को पाकिस्तानी सैनिकों से मुक्त
करवाने की ज़िम्मेदारी मिली। 20 जून 1999 को सुबह 3:30 पर इस चोटी को इन्होने अपने कब्जे
में ले लिया और रेडियो के माध्यम से घोषणा की ‘यह दिल माँगे मोर।’
इसके बाद इन्हें ‘कारगिल का शेर’ की उपाधि भी डी गई। इसके अगले
दिन अखबारों और टेलीविज़न में विक्रम बत्रा का नाम और अपनी टुकड़ी के साथ चोटी 5140 पर
तिरंगा लहराते फोटो छाई हुई थी। इनके कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वाई. के. जोशी
के द्वारा इन्हें ‘शेरशाह’ उपनाम भी दिया था।
इस जीत के बाद इन्हें एक और
बड़ी जीत की ज़िम्मेदारी दी गई। यह थी '4875 वाली संकरी चोटी' पर कब्जा करने की ज़िम्मेदारी।
इसे भी इन्होने अपनी टुकड़ी के साथ स्वयं सबसे आगे नेतृत्व करते हुए वीरतापूर्वक पूरा
किया। परंतु इस दौरान ये बुरी तरह घायल हो गए और 7 जुलाई,
1999 को वीरगति को प्राप्त हुए। इनके अदम्य साहस एवं बलिदान को देखते हुए उन्हें 15
अगस्त, 1999 को भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान ‘परमवीर
चक्र’ से सम्मानित किया गया।
सचमुच उनमें शेर का सा साहस
व पराक्रम था ! नमन है ऐसे वीर बलिदानी को ! कोटि-कोटि नमन ! बारंबार नमन ! शत-शत वंदन
! वंदे मातरम् !


Thanks
जवाब देंहटाएंअल्पायु मे किए गए अद्भुत अदम्य साहस की सुंदर परिभाषा इस लेख के माध्यम से वीर शहीद शेर को शत-शत नमन।
जवाब देंहटाएं🙏🙏🇮🇳🇮🇳
हटाएंCaptain Vikram Batra is a source of inspiration for all of us 🇮🇳
जवाब देंहटाएंYes, very true
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