क्षमा का महत्त्व सभी धर्मों में एक समान ही बताया गया है। इसी महत्त्व को दर्शाता जैन धर्म का त्योहार है- पर्युषण पर्व। दिगंबर जैनी इसे 10 दिवसीय और श्वेतांबर जैनी 8 दिवसीय मनाते हैं। पर्युषण पर्व के अंतिम दिन क्षमावाणी पर्व मनाया जाता है। इसमें सभी से क्षमा माँगी जाती है और सभी को क्षमा किया भी जाता है। इसमें भगवान महावीर कहते हैं- ‘सब जीवों को मैं क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें। सब जीवों से मेरा मैत्री भाव रहे, किसी से वैर भाव नहीं रहे।‘ क्षमा मनुष्य को बड़ा व महान बना देती है। क्षमा हमें झुकना सिखाती है। क्षमा से तनाव दूर हो जाता है, मन शांत हो जाता है, जबकि क्रोध आने पर हमारा चित्त अशांत हो जाता है और मन में बैर-द्वेष की भावना घर कर जाती है। क्षमा वाणी पर्व पर क्षमा को जीवन में उतारना ही सच्ची मानवता है।
अब आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठ सकता है कि क्षमा से जब चित्त
शांत होता है, तो हमें हमेशा ही क्षमा करना और माँगना चाहिए,
इसके लिए कोई एक विशेष दिन ही क्यों चुना जाए ? इसको हम इस तरह समझ सकते हैं
कि – क्षमा माँगना सरल भी नहीं है, हर कोई हर किसी से आसानी से क्षमा नहीं माँग सकता है।
बहुत बार तो मनुष्य दिल से चाहता है पर संकोच या शर्म के कारण नहीं माँग पाता है। कई
बार बेबसी में कोई और उपाय नहीं दिखाई देने पर माँगता है। कभी-कभी किसी के दबाव में
आकर जबर्दस्ती माँगना पड़ता है एवं कई बार तो अहम आड़े आ जाता है और मनुष्य क्षमा माँगता
ही नहीं है।
उपर्युक्त किसी भी तरह की क्षमा माँगने का कोई मतलब या अर्थ नहीं
रह जाता है, जब तक वह सच्चे मन से और शांत चित्त से न माँगी जाए।
इन सभी दुविधाओं के हल के रूप में क्षमावाणी पर्व का एक विशेष दिन सभी को क्षमा माँगने
और करने के लिए निश्चित कर दिया गया। इस दिन सभी तरफ क्षमा का ही वातावरण बन जाता है
तो किसी को भी कोई असुविधा नहीं होती है और क्षमा माँगना व करना दोनों ही आसान हो जाते
हैं। जैन धर्म में इसे ‘मिच्छामि दुक्कड़म’ कहने की परंपरा के साथ क्षमा माँगी जाती है। यहाँ ‘मिच्छामि’
अर्थात् क्षमा करना और ‘दुक्कड़म’ अर्थात् बुरे कर्मों को है,
अर्थात् ‘मेरे बुरे कर्मों के लिए मुझे क्षमा कीजिए।‘
महात्मा गाँधी ने भी क्षमा के संबंध में कहा है ‘’बिना
क्षमा के कोई प्रेम नहीं है और बिना प्रेम के कोई क्षमा नहीं है।’’
रहीम जी का एक बहुत प्रसिद्ध दोहा भी क्षमा के महत्त्व का ही बखान करता है-
क्षमा बड़न
को चाहिए, छोटन को उतपात।
का रहीम हरि
को घट्यो, जो भृगु मारी लात॥
अर्थात् उद्दंडता करने वाले हमेशा छोटे ही कहे जाते हैं और क्षमा
करने वाले बड़े बनते हैं। ऋषि भृगु ने भगवान विष्णु की सहिष्णुता परखने के लिए उनके
सीने पर पाद-प्रहार कर दिया। परंतु क्षमामूर्ति प्रभु लक्ष्मीनाथ ने विनम्रता से उनको
कहा- ‘’ हे ऋषिवर ! कहीं आपके पाँव में चोट तो नहीं लगी ?
मेरा सीना तो वज्र के समान कठोर है और आपके चरण-कमल अत्यंत कोमल हैं !’’
यह सुनकर भृगु बहुत शर्मिंदा हुए और छोटे ही प्रमाणित हुए जबकि महान भगवान का कद और
ऊँचा हो गया।
क्षमा को वीरों का आभूषण भी कहा गया है- ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्।’ इसी अर्थ को बताता एक संस्कृत
श्लोक है-
क्षमा बलम् अशक्तानाम्, शक्तानाम् भूषणम् क्षमा।
क्षमा वशीकृते लोके, क्षमया किं न साधयति॥
अर्थात् क्षमा निर्बलों की शक्ति और बलशाली का आभूषण है। सारा संसार
क्षमा से वश में किया जा सकता है, इससे सभी कार्य सिद्ध हो सकते हैं।
एक अन्य श्लोक के माध्यम से क्षमाशील को महान बताया गया है-
पुष्प कोटि समम् स्तोत्रम्, स्तोत्र कोटि समम् जप:।
जप कोटि समम् ध्यानम्, ध्यान कोटि समम् क्षमा॥
अर्थात् एक करोड़ पुष्पों के समान एक स्तोत्र,
एक करोड़ स्तोत्रों के समान एक जप, एक करोड़ जपों के समान एक ध्यान और एक करोड़ ध्यान के
समान एक बार की क्षमा होती है।
अत: जो मनुष्य क्षमावान और क्षमाशील बन जाता है, वह महान हो जाता है। आइए हम भी अपने मन में यह प्रण करें कि अहम का त्याग करके सभी को क्षमा करेंगे और सभी से क्षमा माँगेंगे। यह सोच और विचार मन में धारण करके जीवन में अपना लें तो हर दिन क्षमा पर्व होगा और चित्त भी शांत रहेगा।


जो मनुष्य क्षमावान और क्षमाशील बन जाता है, वो महान हो जाता है।
जवाब देंहटाएंअत्यन्त विचारणीय post
Dhanyawad
हटाएंक्षमा वीरस्य भूषणम्, बहुत ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है । आप की लेखनी इसी तरह प्रेरित करती रहे व आगे बढते रहे ।👍👍💐🙏🏻
जवाब देंहटाएंDhanyawad 🙏
हटाएंसंसार के सर्वश्रेष्ठ अवसरों में से एक आभूषण है क्षमा जिस पर अत्यंत ही अभिनंदन योग्य कल्याणकारी प्रेरणादाई अनुकरणीय आलेख हेतु शत शत वंदन।
जवाब देंहटाएंDhanyawad 🙏
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