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शनिवार, 29 अगस्त 2020

हॉकी के जादूगर- मेजर ध्यानचंद

       हमारे देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी है। हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद कहलाते हैं। उन्हें हॉकी का जादूगर कहे जाने के पीछे उनकी हॉकी के प्रति लगन और कड़ी मेहनत थी। इसी मेहनत व लगन से उन्होने भारत को ओलंपिक में तीन बार स्वर्ण पदक दिलवाया और भारत में ही नहीं अपितु विश्व में हॉकी के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी बन गए। मेजर ध्यानचंद के जन्म दिवस को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इनका जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश के एक राजपूत परिवार में हुआ था। 1927 में वो सेना में लांस नायक बना दिए गए। अपने अच्छे खेल के कारण उनकी सेना में पदोन्नति होती गई और वे नायक, सूबेदार, लेफ्टिनेंट, कप्तान और बाद में मेजर बना दिए गए। ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समान समझा जाता है।

       1928 में नीदरलैंड में ध्यानचंद ने पहली बार ओलंपिक खेल में भाग लिया था और वहाँ उन्होने 5 मैच में सर्वाधिक 14 गोल किए और भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद 1932 में लॉस एंजिल्स में दुबारा ओलंपिक में इन्होने भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। यहाँ इन्होने यू एस ए को 24-1 से हराकर एक नया ही वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया जो 2003 में ही टूट सका। 1936 में इनकी कप्तानी में भारतीय हॉकी टीम पुन: ओलंपिक खेलने के लिए बर्लिन पहुंची और तीसरी बार स्वर्ण पदक जीतकर मेजर ध्यानचंद ने हैट्रिक बना दी। यह हॉकी खेल का ऐतिहासिक क्षण था। ऐसे ही करिश्माई प्रदर्शन के कारण इन्हें हॉकी का जादूगर कहा जाता है। तीसरा स्वर्ण पदक जर्मनी के खिलाफ और हिटलर के शासन काल में था। यह मैच देखने के लिए हिटलर खुद भी वहाँ मौजूद था, परंतु वह आधा मैच बीच में छोड़कर ही चला गया क्योंकि वह अपने देश की टीम को हारते हुए अपनी आँखों से नहीं देख सकता था। एकबार तो हिटलर को यह भी संशय हुआ कि कहीं ध्यानचंद की हॉकी में कोई चुंबक या कुछ लगा तो नहीं है जिससे बॉल हॉकी के ही चिपक जाती है। जब उसने ध्यानचंद की हॉकी मँगवा कर जांच करवाई तो उसका शक दूर हुआ और वह ध्यानचंद के खेल से बहुत प्रभावित भी हुआ। हिटलर ने ध्यानचंद के खेलने से प्रभावित होकर उसे अपने साथ डिनर पर आमंत्रित किया और जर्मनी की तरफ से खेलने का प्रस्ताव भी रखा। ध्यानचंद ने हिटलर को यह कहते हुए उनका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि मेरा देश भारत है और मैं इसके लिए ही खेलूँगा।

       इस प्रस्ताव को ठुकरा कर ध्यानचंद ने यह साबित कर दिया कि वो एक महान खिलाड़ी होने के साथ-साथ सच्चे देशभक्त भी हैं। उनकी इसी देशभक्ति को ध्यान में रखते हुए ही उनके जन्मदिवस को राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाकर सम्मान दिया जाता है। मेजर ध्यानचंद ने अपना अंतिम मैच 1948 में खेला। उन्होने अपने संपूर्ण खेलकाल में कुल 1000 से अधिक गोल करके एक रिकॉर्ड बनाया। इनके जन्मदिवस के दिन ही खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रपति भवन में देश के राष्ट्रपति खेल पुरस्कारों से सम्मानित करते हैं। इन पुरस्कारों में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार, तेनजिंग नोर्गे राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार आदि हैं।

       मेजर ध्यानचंद के हॉकी में बनाए रिकॉर्ड आज तक कोई खिलाड़ी तोड़ नहीं पाया है। उन्हें 1956 में भारत के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 3 दिसंबर 1979 में 74 वर्ष की आयु में इनका स्वर्गवास हो गया था। भारतीय ओलंपिक संघ ने उन्हें शताब्दी का खिलाड़ी घोषित किया था। देश में उन्हें भारत रत्न देने की माँग भी उठती रही है। आज इनके जन्म दिवस पर हम आशा और ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हॉकी में इनके अमूल्य और अतुलनीय योगदान को देखते हुए इन्हें भारत रत्न भी दिया जाए। 
    
           हॉकी के जादूगर को शत्-शत् नमन 
    



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