मनुष्य बहुत ही आशावादी प्राणी है। वह कितनी भी मुसीबतें आए परन्तु उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता है, इसकी यही विशेषता इसे पृथ्वी के सभी प्राणियों से अलग और अनूठा बनाती है।
इतिहास गवाह है कि मनुष्य ने कभी भी हालातों के आगे घुटने नहीं टेके हैं, परन्तु आज विश्व पर कोरोना महामारी नामक संकट के जो काले बादल गहराए हैं, इसमें मनुष्य को आनेवाला समय अंधकारमय दिखाई दे रहा है, विशेषकर आर्थिक संकटरूपी अँधेरा।
इतिहास से ही शिक्षा लेते हुए हमें अभी भी उम्मीदों को नहीं टूटने देना है, क्योंकि जीवन में सुख-दुःख तो धूप और छाँव की तरह आते-जाते रहते हैं। जिस तरह रात्रि के पश्चात् प्रभात निश्चित रूप से उदय होता है, उसी प्रकार ये महामारी का काला बादल भी छँट जायेगा और ज़िन्दगी एक बार पुनः पूर्व की तरह ही हँसती-खिलखिलाती हुई पटरी पर लौट आएगी। बस उस परमपिता परमेश्वर पर हमारा विश्वास नहीं टूटना चाहिए। इसी सन्देश को देती मेरी आज की कविता है -
आशा के दीप
आओ, आशा के नए दीप जलाएँ,
ग़म के अँधेरे दूर भगाएँ।
कल था जो कल बीत चुका है,
आगे का कल किसने देखा है?
आज अभी है संग हमारे,
खुशियों से हम इसे सजाएँ।1।आशा के नए..............
माना संकट बहुत बड़ा है,
राह में बाधा बने खड़ा है।
हम सब मिलकर, आगे बढ़कर,
आओ इसको मज़ा चखाएँ।2।आशा के नए..............
दुःख-सुख जीवन के दो साथी,
जैसे संग दिया और बाती।
बिन एक दूजे के रहें अधूरे,
मिलकर दोनों प्रकाश फैलाएँ।3।आशा के नए..............
सीमा शर्मा


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जवाब देंहटाएंजोत से जोत जलाते चलो प्रेम की गंगा बहाते चलो ऐसा ही शिक्षाप्रद आज का आलेख है जिसके लिए ह्रदय से अभिनंदन।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद भाई।🙏
हटाएंइसी तरह प्रोत्साहन प्राप्त होता रहेगा तो भविष्य में भी मैं इस लघु लेखन अभ्यास को निरंतर बनाए रखने का प्रयास करूंगी।🙏
Bahut badhiya
जवाब देंहटाएंDHANYWAD
हटाएंHar gam ke baad khushiyan aati h😊.....ye sankat ki 🕰️ bhi avashya chali jayegi or jeevan vapas patri pr aa jayegi. Aasha kabhi na chhodein😇
जवाब देंहटाएंAASHAYEN HI TO MANUSHY KO JENE KA HAUSALA PRADAN KARTI HAIN
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