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गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

2020 का सबक़

 2020 तुम जाओ, ना अब तुमसे कुछ गिला है।

वह सब तुमने सिखाया, जो किसी से भी ना मिला है।

 

कहते हैं सब कि, तुम आए, कोरोना लाए।

रोजगार काम धंधे, सब तुमने छुड़वाए।

सपने जो देखेतुमने  वह भी तुड़वाए।

तुम्हारी मार से, बचा ना कोई गांव-जिला है।

2020 तुम जाओ, ना अब तुमसे कोई गिला है।

 

कितनों से तुमने उनके, अपने छीन लिए।

कितनों की छत छीनी, कितने घर-हीन किए।

कितने सेठ-साहूकार, तुमने दर-दीन किए।

कितनों का विश्वास डगमगाया और हिला है।

2020 तुम जाओ, ना अब तुमसे कुछ गिला है।

 

माना तुमने सबको, बेड़ियों में जकड़ दिया।

सारी दुनिया को डावांडोल, और गड़बड़ किया।

जैसे सब को समय ने ही, रोका और पकड़ लिया।

लगता हर दिन जैसे, रहस्य भरा एक किला है।

2020 तुम जाओ, ना अब तुमसे कुछ गिला है।

 

लेकिन इन सबके अलावा, तुमने बहुत कुछ सिखाया है।

अनेकों एकाकी लोगों को, अब रिश्ते निभाना आया है।

निराशा के अंधेरे में तुमने, आशाओं का उजाला फैलाया है।

हर अंधेरी रात के बाद, सुनहरे प्रभात का सिलसिला है।

2020 तुम जाओ, ना अब तुमसे कुछ गिला है।



बुधवार, 16 सितंबर 2020

विश्व ओजोन दिवस

      आज 16 सितंबर को विश्व ओजोन दिवस है ।ओजोन परत का नाम तो सभी ने सुना ही है । 'ओजोन परत में छेद हो गया है' यह भी हम सभी पिछले कुछ वर्षों से सुनते आ रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ओजोन परत क्या है ? इसमें छेद कैसे हुआ ? ओजोन दिवस मनाने की शुरुआत कब से और क्यों हुई ? अनेक सवाल हैं जिनके जवाब हममें से बहुत कम लोग ही जानते हैं। आइए ! अब समय आ गया है कि हमें इन सभी के बारे में जानना चाहिए । ओजोन परत को बचाने में अपना योगदान देना चाहिए और दूसरों को भी जागरूक करना चाहिए।

   ओजोन परत हमारी धरती के वायुमंडल का एक आवरण या पर्दा है। इसमें ओजोन नामक गैस की मात्रा अपेक्षाकृत सघन या गहरी होती है। इसी ओजोन परत के आवरण के कारण पृथ्वी पर हमारा जीवन संभव होता है, क्योंकि यही आवरण सूर्य से आने वाली तेज पराबैंगनी किरणों को लगभग 93-99 प्रतिशत तक अपने अंदर सोखकर धरती पर आने से रोकती है। अन्यथा यह पृथ्वी पर विनाशकारी और जीवन पनपने के लिए भारी पड़ती है। धरती के वायुमंडल की 91 प्रतिशत से भी ज्यादा ओजोन गैस इसी क्षेत्र में रहती है । इसीलिए इसे ओजोन परत कहते हैं।

   ओजोन परत की खोज फ्रांस के भौतिक वैज्ञानिकों  फैबरी चार्ल्स और हेनरी बुसोन ने 1913 में की थी ।ओजोन परत के गुणों और आवश्यकता के बारे में विस्तृत रूप से ब्रिटेन के मौसम वैज्ञानिक जी एम बी डोबसन ने अध्ययन किया था । उनके द्वारा एक सरलता पूर्वक भूतल से ओजोन को मापने का मीटर बनाया गया, जिसे स्पेक्ट्रोफोटोमीटर के नाम से जाना जाता है।डोबसन ने विश्व भर में ओजोन की निगरानी के लिए नेटवर्क स्थापित किया, जो अभी भी कार्यरत है। उनके इसी महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उनके सम्मान में ओजोन की मात्रा मापने की इकाई का नाम भी डोबसन इकाई रखा गया।

      वर्ष 1985 मैं सर्वप्रथम ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के वैज्ञानिकों द्वारा ओजोन परत के छेद की खोज की गई। इस छेद के लिए सी एच सी अर्थात क्लोरोफ्लोरोकार्बन नामक हानिकारक गैस को उत्तरदाई माना गया। तत्पश्चात इस हानिकारक गैस की रोक के लिए विश्व के सभी देश एकमत हुए और 16 सितंबर 1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर दस्तखत किए गए।

         16 सितंबर 1994 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ओजोन परत की सुरक्षा एवं बचाव के लिए 'अंतर्राष्ट्रीय ओजोन दिवस' मनाने की घोषणा की। इसके अगले वर्ष प्रथम विश्व ओजोन दिवस 16 सितंबर 1995 में मनाया गया। तब से प्रत्येक वर्ष यह दिवस मनाया जाता है। इसे मनाने का मुख्य उद्देश्य ओजोन परत के बारे में सभी को जागरूक करना और इसे बचाने के उपायों की तरफ ध्यान केंद्रित करना है।

     वर्तमान समय में मानव धरती पर रहते हुए भी चांद, मंगल और ना जाने कहां-कहां जीवन की संभावनाएं तलाश रहा है। परंतु जिस जीवनदायिनी धरती पर रहता है, उसी की सुरक्षा के प्रति लापरवाह हो गया है। वह भूल गया है कि वह विकास की अंधी दौड़ में एक दूसरे से आगे बढ़ने के चक्कर में अपनी स्वर्ग जैसी धरती को नर्क जैसी पीड़ादायिनी बना रहा है । वह भूल गया है कि इस धरती पर जीवन को पनपने में करोड़ों साल लगे थे । बहुत संघर्ष के बाद यह धरती जीवनदायिनी बनी थी। आज वही इंसान प्रकृत से असीमित छेड़छाड़ कर उसे विध्वंसकारी बना रहा है । इसके परिणाम समय-समय पर प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखने को मिलते रहते हैं। परंतु मनुष्य आंखें मूंदे बैठा है । इसी प्राकृतिक छेड़छाड़ के फलस्वरुप ओजोन परत में छेद भी बढ़ता जा रहा है। इसके बचाव के लिए फोम के गद्दों का इस्तेमाल नहीं किया जाए , प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगे, ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएं , वनों के कटाव पर नियंत्रण हो आदि प्रयास करने होंगे।

     ओजोन परत को बचाने के लिए बाजार में ओजोन फ्रेंडली फ्रिज, एसी, कूलर आ गए हैं। उनका प्रयोग करें गाड़ियों से फैलने वाले प्रदूषण, फैक्ट्रियों - कारखानों का धुआं , जंगलों में लगने वाली आग आदि भी ओजोन परत को नुकसान पहुंचाते हैं । मनुष्य की अगली पीढ़ियां स्वस्थ माहौल में सांस ले सके इसके लिए ओजोन परत की सुरक्षा की मुहिम में अपना योगदान देना होगा।

      वर्ष 2020 में विश्व ओजोन दिवस की थीम है- 'जीवन के लिए ओजोन : ओजोन परत संरक्षण के 35 साल।' इस वर्ष वैश्विक ओजोन परत संरक्षण के 35 वर्ष पूरे हो गए हैं। यह मुहिम 1985 से प्रारंभ हुई थी। यह थीम हमें यह भी बताती है कि पृथ्वी पर जीवन के लिए ओजोन कितना महत्वपूर्ण है। इसलिए अपनी भावी संतानों को हम जीवन के लिए स्वस्थ पर्यावरण और पृथ्वी भेंट में दे सकें इसके लिए आज और अभी से सब को प्रयास करना होगा।

ओजोन परत





मंगलवार, 15 सितंबर 2020

अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस

  भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इसलिए लोकतंत्र का अर्थ जानने के लिए भारत से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता। आज 15 सितंबर अर्थात अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस है। लोकतंत्र अर्थात जहां जनता को अपना नेता, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति आदि चुनने की स्वतंत्रता हो । अपने विचार व्यक्त करने की आजादी हो और अपने धर्म पर चलने की स्वतंत्रता हो। सरल भाषा में कहें तो हर तरह की आजादी हो, जब तक किसी दूसरे की आजादी को नुकसान न पहुंचता हो ।आज विश्व में लोकतंत्र दिवस मनाने का कारण भी यही है, क्योंकि आजादी हर किसी को पसंद होती है। हिंदी में कहा भी गया है-

'पराधीन सपनेहु सुख नाहीं' अर्थात गुलामी या परतंत्रता में तो सपने में भी सुख नहीं है।

  अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस की शुरुआत कब और क्यों हुई? वर्ष 2007 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस दिवस को मनाने की घोषणा की। इसका प्रमुख उद्देश्य लोकतंत्र का प्रचार करना और इसके प्रचार-प्रसार के लिए किए जाने वाले राष्ट्रीय कार्यक्रमों में मजबूती लाना है। इसके माध्यम से विश्व को सुशासन की सौगात देना भी है ।लोकतंत्र की परिभाषा के रूप में सभी ने विद्यालय शिक्षा में पढ़ा है । सबसे प्रसिद्ध परिभाषा अब्राहम लिंकन की है जो प्रत्येक व्यक्ति को याद है- "लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए किया जाने वाला शासन है" लेकिन इसका मतलब सिर्फ इतना ही नहीं है। इसको हम व्यापक अर्थ में ले सकते हैं , जैसे किसी भी राष्ट्र में रहने वाले व्यक्तियों को समाज में समान अवसर प्राप्त    हों और सभी देशवासी अपने समाज की राजनीति में एक समान भागीदार बनें। इस तरह इसका अर्थ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप में व्यापक हो जाता है।

    विश्व में दो प्रकार की लोकतंत्र प्रणाली प्रचलित है -प्रथम संसदीय प्रणाली और दूसरी और द्वितीय राष्ट्रपति शासन प्रणाली। दोनों ही प्रणालियों में प्रजा अपने मताधिकार का प्रयोग अपने देश का जनप्रतिनिधि चुनने के लिए करती है । वह जनप्रतिनिधि चुने जाने के पश्चात अपने देश की प्रजा के लिए कार्य करने को प्रतिबद्ध होता है। भारत , कनाडा , इंग्लैंड , ऑस्ट्रेलिया आदि राष्ट्रों में संसदीय शासन प्रणाली लागू है , जबकि अमेरिका और कुछ अन्य राष्ट्रों में राष्ट्रपति शासन प्रणाली अपनाई गई है । जैसा कि नाम से ही परिलक्षित हो रहा है कि राष्ट्रपति शासन प्रणाली में सभी अधिकार एवं निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिए जाते हैं , जबकि संसदीय शासन प्रणाली में शक्ति राष्ट्रपति के पास नहीं होती है। इसमें संसद के दोनों सदनों और विशेषकर प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल अर्थात लोकसभा सदस्य आदि से विचार विमर्श के बाद अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री द्वारा लिया जाता है।

   भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र वाला देश है । यहां लगभग 60 करोड़ से भी ज्यादा लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करके अपने जनप्रतिनिधि एवं सरकार का चुनाव करते हैं। लोकतंत्र ही वह धागा है जिसने इतने बड़े राष्ट्र को इतनी विविधताओं के पश्चात भी एक सूत्र में पिरो कर रखा है। यहां पर जो लोग सरकार की नीतियों या कार्यों से संतुष्ट नहीं हों तो शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख कर अपना विरोधी या असहमति जता सकते हैं।

    वर्ष 2020 जब दुनिया में कोरोना महामारी का संकट है , ऐसे में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा कहा गया यह वक्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है "ऐसे समय में जब पूरा विश्व कोविड-19 से जूझ रहा है , लोकतंत्र सूचना का मुक्त प्रवाह है। निर्णय लेने में भागीदारी और महामारी की प्रतिक्रिया के लिए जवाबदेही सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।"

     इस वर्ष की अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस की थीम भी कोरोना को भी ध्यान में रखकर निश्चित की गई है -'कोविड-19 लोकतंत्र पर एक स्पोट-लाईट'

    कोरोना महामारी की आपदा से विश्व भर में सामाजिक,  राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक , शारीरिक , शैक्षिक , मानसिक और कानूनी चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है, ऐसे में प्रत्येक राष्ट्र इस संकट से उबरने के रास्तों को अपना रहा है ।  इस समय यह अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस संकट के समय में सभी राज्य एवं प्रदेश कानून एवं शासन को सुचारू बनाए रखें । आधारभूत सिद्धांतों की रक्षा एवं सम्मान करते रहे और विधि, इलाज एवं बचाव और न्याय एवं कानून की उचित प्रक्रिया का उपयोग करने का अधिकार सभी को प्रदान करें।

जनता जनार्दन की ताकत

 

सोमवार, 14 सितंबर 2020

हिंदी दिवस

                                        हिंदी हिंद का मन है,  मन के बिना कैसा तन है?

                                        हिंदी भाषा है राष्ट्रभाषा, इसके बिना क्या जनजीवन है?


आज 14 सितंबर हिंदी दिवस है। हिंदी को जिस स्थान पर होना चाहिए था, वह उससे बहुत दूर है। हमें इसको इसका सम्माननीय स्थान दिलाने के लिए कुछ कदम उठाने पड़ेंगे। सर्वप्रथम तो हमें हिंदी के सम्मान की बात केवल हिंदी दिवस के दिन ही नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन करनी होगी अर्थात प्रत्येक दिवस को ही हिंदी दिवस बनाना होगा l हिंदी में बात करना शर्म की बात नहीं, बल्कि गर्व की बात होनी चाहिए l जब हमें हिंदी बोलने में गर्व का अनुभव होगा, तो हमारे अंदर आत्मविश्वास स्वत: ही आ जाएगा l आत्मविश्वास आने पर आत्मनिर्भरता भी आ जाएगी l 


कुछ लोगों को यह लग सकता है कि चारों तरफ तो अंग्रेजी एवं अन्य विदेशी भाषाओं का बोलबाला है, ऐसे में हिंदी के साथ कहां तक चल पाएंगे ? दोस्तों ! मैंने हिंदी को उसका उचित स्थान एवं सम्मान देने की बात कही है, किसी अन्य भाषा को छोड़ने या अपमान करने के लिए नहीं कहा है l हां, लेकिन किसी अन्य भाषा को सीखने के लिए अपनी भाषा को छोड़ना यह अपमान करना या उसे बोलने में शर्म अनुभव करना निसंदेह अनुचित है l जिस प्रकार हम अपनी मां को चाहे वह कैसी भी हो, किसी सुंदर अत्याधुनिक विचारों वाली पढ़ी-लिखी महिला या आंटी के लिए प्यार करना नहीं छोड़ सकते l ठीक वैसे ही हमें किसी दूसरी भाषा को पढ़ने - सीखने या उसमें जीविका चलाने के लिए मनाही नहीं है परंतु उसके लिए हिंदी को भूलना - छोड़ना गलत है l


आज तो हिंदी वैश्विक पटल पर छाने लगी है l संगणक अर्थात कंप्यूटर के जमाने में हिंदी कदम से कदम मिलाकर साथ चल रही है l गूगल पर  हिंदी में टंकण अर्थात टाइप करने के लिए अनेक सुविधाएं हैं l जिन्हें हिंदी टाइपिंग नहीं आती, वह भी आसानी से अंग्रेजी वर्णमाला के द्वारा हिंदी में टाइप कर सकते हैं l  इससे भी एक कदम आगे और बढ़ाएं तो केवल बोल कर भी आप हिंदी में लिखित रूप में प्राप्त कर सकते हैं l किसी अन्य भाषा की सामग्री को भी आप हिंदी भाषा में बड़ी आसानी से परिवर्तित कर सकते हैं l जिस तरह अंग्रेजी टाइप करते समय कंप्यूटर स्वत: व्याकरणिक रूप से शुद्ध वर्तनी के लिए लाल रेखा से बताता है वैसी ही सुविधा हिंदी टंकण में भी उपलब्ध है l


उपर्युक्त  सभी सुविधाएं आपके कंप्यूटर और मोबाइल दोनों में ही उपलब्ध है l कंप्यूटर और मोबाइल के अतिरिक्त भी हम देखते हैं कि हिंदी भाषा जगत बहुत विस्तृत है l इसमें जीविका के बहुत विकल्प उपलब्ध हैं l हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले विद्यार्थी अनेक तरह से इसमें जीविका चला सकते हैं - जैसे अध्यापन, लेखन, पत्रकारिता, अनुवादक,  समाचार वाचक, संवाददाता, प्रशासनिक सेवा, पुलिस विभाग, पुरातत्व विभाग, पर्यटन गाइड, अभिनय, भाषा विभाग आदि  l इन सबके अलावा भी आजकल सोशल मीडिया पर ब्लॉग लेखन, यूट्यूब चैनल और वीडियो, फेसबुक, टि्वटर, इंस्टाग्राम आदि सभी पर हिंदी में धूम मची रहती है l  इन सब के माध्यम से नई पीढ़ी प्रसिद्धि के साथ-साथ धन भी कमा रही है l टेलीविजन पर बॉलीवुड फिल्में,धारावाहिक, समाचार, अनेक नृत्य - गायन के लाइव कार्यक्रम, कॉमेडी शो, कवि सम्मेलन, चर्चा, वाद-विवाद प्रतियोगिताएं, विज्ञापन आदि शब्द हिंदी में ही होते हैं l


दोस्तों ! समय परिवर्तनशील होता है, इसलिए समय के साथ बदलाव आवश्यक है, परंतु अपनी जड़ों को छोड़कर नहीं l इसलिए आइए ! आज हम अपनी जड़ों से जुड़ते हुए आधुनिक रंग रूप के साथ हिंदी को अपनाकर, उसे सबके सामने प्रस्तुत करने की प्रतिज्ञा लें l इस नए रंग रूप में हम हिंदी को कठिनाई से सरलता की तरफ, नीरसता से सरसता की तरफ और संकीर्णता से विस्तृतता की तरफ लेकर चलते हैं l


                                            हिंदी को आगे बढ़ाएंगे, हम ऊंचा  इसे उठाएंगे l

                                            एक दिन ही नहीं, हर रोज यह दिवस मनाएंगे।


                                    हिंदी  पढ़ें और पढ़ाएं,  देश को आगे बढ़ाएं l





गुरुवार, 10 सितंबर 2020

पंडित गोविंद वल्लभ पंत

 

दोस्तों ! 14 सितंबर अर्थात् हिन्दी दिवस आनेवाला है। हिन्दी भारत की राजभाषा भी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में मुख्य योगदान किसने दिया था ? ये थे भारतरत्न प्राप्त, उत्तरप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री और भारत के चौथे गृहमंत्री पंडित गोविंद वल्लभ पंत, जिन्हें सभी जी.बी.पंत के नाम से भी जानते हैं।

पंडित गोविंद वल्लभ जी का जन्म ब्रिटिश भारत के अल्मोड़ा जिले के श्यामली पर्वतीय क्षेत्र के गाँव खूँट में 10 सितंबर 1887 को हुआ था। यह क्षेत्र वर्तमान में उत्तराखंड में स्थित है। इनके पिताजी का नाम श्री मनोरथ पंत और माताजी का नाम श्रीमति गोविंदी बाई था। गोविंद वल्लभ जी पढ़ाई में बहुत तेज थे। इन्होने 1907 में म्योर सेंट्रल कॉलेज, इलाहाबाद से बी.ए. में गणित, साहित्य और राजनीति विषयों में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। 1909 में यहीं से कानून की डिग्री भी सर्वाधिक अंकों के साथ प्राप्त की। इसके लिए इन्हें कॉलेज की तरफ से लेम्सडेन अवार्ड भी दिया गया। अध्ययन के साथ-साथ ही इन्होने कांग्रेस के स्वयं सेवक का कार्य करना भी शुरू कर दिया था। कानून की डिग्री लेने के बाद ये 1910 में वापस अल्मोड़ा आ गए और यहाँ वकालत शुरू कर दी। इसके लिए ये पहले रानीखेत और इसके बाद काशीपुर आ गए। यहाँ इन्होने प्रेमसभा नामक संस्था का गठन किया जिसका कार्य शिक्षा और साहित्य के प्रति जनता में जागरूकता पैदा करना था। प्रेमसभा का कार्य इतने विस्तृत स्टार पर हुआ कि ब्रिटिश स्कूलों का तो काशीपुर से सूपड़ा ही साफ अर्थात् पूरी तरह समाप्त हो गए।

गोविंद वल्लभ जी ने स्वतन्त्रता संघर्ष में भी भाग लिया। वे गांधीजी से बहुत प्रभावित थे और उन्हीं के कहने पर 1921 में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 9 अगस्त 1925 को हुए प्रसिद्ध काकोरी कांड के नवयुवकों के मुकदमे की पैरवी के लिए पंत जी-जान से जुट गए थे। तब वे नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य थे। इन्होने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को काकोरी कांड के लिए दोषी पाए जाने पर फाँसी की सजा रुकवाने का भी भरसक प्रयास किया था। इसके लिए इन्होने पंडित मदन मोहन मालवीय जी और उस समय के भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन को पत्र भी लिखा, परंतु गांधीजी द्वारा सहमति व समर्थन नहीं मिलने के कारण फाँसी टल न सकी। 1928 में आए साइमन कमीशन का इन्होने पुरजोर बहिष्कार किया और 1930 के नमक सत्याग्रह में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इसके फलस्वरूप मई, 1930 में इन्हें देहारादून जेल में डाल दिया गया।

ब्रिटिश भारत में वो दो बार संयुक्त प्रांत अर्थात यू.पी. के मुख्यमंत्री बने थे। पहली बार 17 जुलाई,1937-2 नवंबर, 1939 तक तथा पुन: 1 अप्रैल,1946-15 अगस्त, 1947 तक। भारत की आजादी के बाद जब 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ, तब स्वतंत्र भारत के संयुक्त प्रांत का नाम परिवर्तित कर उत्तर प्रदेश रखा गया। इस नवनामित उत्तरप्रदेश राज्य का मुख्यमंत्री एकबार पुन: सर्व सम्मति से इन्हें ही बनाया गया। 26 जनवरी, 1950-27 दिसंबर, 1954 तक ये उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत रहे। गृहमंत्री पद पर रहते हुए जब लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का निधन हुआ तो इन्हें गृह मंत्रालय, भारत सरकार के प्रमुख की ज़िम्मेदारी दी गई। 2 मार्च, 1955-7 मार्च, 1961 तक ये भारत के चौथे गृहमंत्री रहे। गृहमंत्री पद पर रहते हुए ही 7 मार्च, 1961 को 73 वर्ष की आयु में इनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

गृहमंत्री रहते हुए ही इन्होने भारत को भाषा के अनुसार राज्यों में बांटना और हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्थापित करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए। इनके अतुलनीय योगदान को देखते हुए ही 1957 में भारत सरकार द्वारा इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया गया। इनके नाम पर कई प्रसिद्ध स्मारक और संस्थान हैं-

1.   गोविंद वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज, उत्तरप्रदेश

2.   गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्व विद्यालय, पंतनगर, उत्तराखंड

3.   गोविंद वल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड

4.   गोविंद वल्लभ पंत सागर, सोनभद्र, उत्तरप्रदेश

5.   पंडित गोविंद वल्लभ पंत इंटर कॉलेज, काशीपुर, ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड

इनके अलावा भी अनेक अस्पताल और शिक्षण संस्थाएं भी देशभर में कार्यरत हैं।



     

बुधवार, 9 सितंबर 2020

कारगिल का शेर – कैप्टन विक्रम बत्रा

 

    दोस्तों ! कारगिल का युद्ध तो आप सभी को याद ही होगा ! जब हर गाँव से कई-कई वीरों ने एकसाथ देश के लिए जान की बाजी लगा दी थी। हर घर का बच्चा-बच्चा देशभक्ति के जोशीले गीत गाकर, देशप्रेम के ही नारे लगा रहा था। हर बच्चा सेना में जाने का ही सपना देखने लगा था। उन अनेकों वीरों में से एक बहादुर व साहसी देशभक्त थे – कैप्टन विक्रम बत्रा। जिन्हें इनकी वीरता एवं साहस के कारण कारगिल का शेर कहा जाने लगा। भारत सरकार द्वारा इन्हें मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

    विक्रम का जन्म 9 सितंबर, 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ था। इनकी माताजी का नाम श्रीमति कमलकान्ता बत्रा एवं पिताजी का नाम श्री जी.एल. बत्रा था। इन्हीं के साथ इनके जुड़वाँ भाई विशाल का भी जन्म हुआ था। इनकी माताजी श्रीरामचरितमानस से बहुत प्रभावित थीं, इसलिए उन्होने इनका नाम लव और इनके जुड़वाँ भाई विशाल का नाम कुश रखा था। इनकी दो बड़ी बहनें भी हैं। इन्होने प्रारम्भिक शिक्षा पालमपुर के ही डी.ए.वी. और सेंट्रल स्कूल से प्राप्त की। ये पढ़ने में बहुत होशियार थे और इसके साथ-साथ टेबल-टेनिस के भी बहुत अच्छे खिलाड़ी थे। स्कूल के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। सेना छावनी के स्कूल अनुशासन और पिता द्वारा देशप्रेम की कहानियों के प्रभाव से इनमें बचपन से ही देशभक्ति की प्रबल भावना थी। इसके बाद इन्होने डी.ए.वी. कॉलेज, चंडीगढ़ से विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई की। कॉलेज में इन्हें एन.सी.सी. का सर्वश्रेष्ठ कैडेट चुना गया और इन्होने गणतन्त्र दिवस की परेड में भी हिस्सा लिया।

    इसके बाद 'संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा' (सी.डी.एस.) की तैयारी करते हुए इनका हांगकांग में मर्चेन्ट नेवी में भी चुनाव हो गया था परंतु इन्हें तो सेना में जाना था इसलिए इन्होने उसे ठुकरा दिया था। इसके बाद इनका सी.डी.एस. में चयन हो गया और भारतीय सैन्य अकादमी देहारादून में प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद 6 दिसंबर, 1997 को जम्मू के सोपोर सेना की ’13 जम्मू-कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के पद पर नियुक्ति मिली। जून 1999 में कारगिल युद्ध में 'हम्प' व 'राकी नाब' स्थानों को जीतने के बाद उन्हें कैप्टन पद दिया गया।

    कैप्टन बनने के बाद इन्हें 'श्रीनगर-लेह-मार्ग' के ऊपर सबसे महत्त्वपूर्ण '5140 चोटी' को पाकिस्तानी सैनिकों से मुक्त करवाने की ज़िम्मेदारी मिली। 20 जून 1999 को सुबह 3:30 पर इस चोटी को इन्होने अपने कब्जे में ले लिया और रेडियो के माध्यम से घोषणा की यह दिल माँगे मोर। इसके बाद इन्हें कारगिल का शेर की उपाधि भी डी गई। इसके अगले दिन अखबारों और टेलीविज़न में विक्रम बत्रा का नाम और अपनी टुकड़ी के साथ चोटी 5140 पर तिरंगा लहराते फोटो छाई हुई थी। इनके कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल वाई. के. जोशी के द्वारा इन्हें शेरशाह उपनाम भी दिया था।

    इस जीत के बाद इन्हें एक और बड़ी जीत की ज़िम्मेदारी दी गई। यह थी '4875 वाली संकरी चोटी' पर कब्जा करने की ज़िम्मेदारी। इसे भी इन्होने अपनी टुकड़ी के साथ स्वयं सबसे आगे नेतृत्व करते हुए वीरतापूर्वक पूरा किया। परंतु इस दौरान ये बुरी तरह घायल हो गए और 7 जुलाई, 1999 को वीरगति को प्राप्त हुए। इनके अदम्य साहस एवं बलिदान को देखते हुए उन्हें 15 अगस्त, 1999 को भारत सरकार द्वारा मरणोपरांत सर्वोच्च वीरता सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

    सचमुच उनमें शेर का सा साहस व पराक्रम था ! नमन है ऐसे वीर बलिदानी को ! कोटि-कोटि नमन ! बारंबार नमन ! शत-शत वंदन ! वंदे मातरम् !   

कारगिल का शेर – कैप्टन विक्रम बत्रा


मंगलवार, 8 सितंबर 2020

विश्व साक्षरता दिवस

 

       आज 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस है। शिक्षा और साक्षरता पर जितनी भी बातें की जाएँ, कम हैं। यह एक ऐसा विषय है जिस पर आज से पहले भी बहुत सारी चर्चा हो चुकी है। हर बार इन चर्चाओं में शिक्षा की नई आवश्यकताएँ, नई तकनीक, नई विधियाँ बहुत ही रोचक तरीके से सामने आती रही हैं। विश्व साक्षरता दिवस की शुरुआत कब, कैसे हुई एवं इसके उद्देश्य क्या हैं, यह जान लेना भी अति आवश्यक है। युनेस्को द्वारा 17 नवंबर 1965 में 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया गया। पहली बार इसे 8 सितंबर 1966 में मनाया गया। वर्ष 2009-10 में संयुक्त राष्ट्र दशक घोषित किया गया। तब से सम्पूर्ण विश्व में 8 सितंबर को विश्व साक्षरता दिवस मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य समाज में लोगों का शिक्षा को प्राथमिकता और बढ़ावा देना और दुनिया से निरक्षरता को समाप्त करना है।

       संयुक्त राष्ट्र की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में लगभग 4 अरब लोग शिक्षित हैं, इसके बावजूद भी 1 अरब लोग अशिक्षित हैं। 2018 की गणना के अनुसार 5 में से 1 व्यक्ति निरक्षर है, और अब विश्व की जनसंख्या 7.7 अरब हो चुकी है। भारत के परिपेक्ष्य में बात करें तो भारत अभी पूर्ण साक्षरता से दूर है। भारत का साक्षरता प्रतिशत वैश्विक स्तर के 75% से काफी नीचे है। भारत में साक्षरता को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, इसमें भी महिलाओं का साक्षरता स्तर और भी कम है। भारत में पूर्ण साक्षरता वाला राज्य केरल है, यह बहुत अच्छी खबर है। साक्षरता का अर्थ केवल पढ़ना-लिखना ही नहीं है, अपितु अपने कर्तव्यों और अधिकारों को जानकर सामाजिक विकास में योगदान देना है। गरीबी, असमानता आदि समस्याएँ भी तभी समाप्त हो सकती हैं।

       इस वर्ष कोरोना महामारी के कारण शिक्षा पर और भी घनी काली छाया मँडराने लगी है। इस बार की साक्षरता दिवस की थीम है- साक्षरता शिक्षण और कोविड-19: संकट और उसके बाद। इस वर्ष इस अवसर पर शिक्षकों की भूमिका और बदली शिक्षा पद्धति पर ज़ोर दिया जा रहा है। इसी के तहत सभी सरकारें और शिक्षक इस बार ऑनलाइन शिक्षा पर ही ज़ोर ड़े रहे हैं और तकनीक के माध्यम से शिक्षा प्राप्ति के लक्ष्य को पूरा करने का सफल प्रयास कर रहे हैं।

       शिक्षा के महत्त्व को बताते संस्कृत में भी श्लोक हैं-

1.   माता शत्रु: पिता वैरी येन बालो न पाठित:।

       न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥

       अर्थात् जो अपने बालक को पढ़ाते नहीं, ऐसी माता शत्रु समान और पिता वैरी है, क्योंकि जिस तरह हंसों के बीच बगुले के शोभा नहीं होती, वैसे ही अनपढ़ मनुष्य भी विद्वानों की सभा में शोभा नहीं पाते। अत: सभी मनुष्यों को अपनी संतान को शिक्षा जरूर दिलवानी चाहिए।

2.       रूपयौवन संपन्ना विशाल कुल संभवा:।

विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुका:॥

       अर्थात् रूप सम्पन्न, यौवन सम्पन्न और चाहे विशाल कुल में पैदा क्यों न हुए हों, पर जो विद्याहीन हों, तो वे सुगंध रहित केशुड़े के पुष्प की भांति शोभा नहीं देते।

3.       विद्या ददाति विनयम् विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मं तत: सुखम्॥

       अर्थात् विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है, अत: सभी सुखों की प्राप्ति के लिए विद्या प्राप्ति अत्यावश्यक है।

        

विश्व साक्षरता दिवस

शनिवार, 5 सितंबर 2020

शिक्षक दिवस

 

                     गुरुर्ब्रहमा गुरुर्विष्णु:, गुरुर्देवो महेश्वर:।

                     गुरु: साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नम:॥

       गुरु की महिमा बताने वाले इस श्लोक को तो आप सबने कई बार सुना होगा। आज गुरु के सम्मान का ही दिन है। आज 5 सितंबर को सभी भारतवासी शिक्षक दिवस मना रहे हैं और अपने शिक्षकों को धन्यवाद एवं सम्मान दे रहे हैं। क्या आप जानते हैं कि 5 सितंबर को ही शिक्षक दिवस क्यों मनाया जाता है ? 5 सितंबर को भारत के पहले उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रह चुके डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन है। जब वे राष्ट्रपति बने थे तो उनके कुछ छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने के लिए कहा, तब डॉ. राधाकृष्णन ने उनसे कहा कि- वो उनके जन्मदिन को शिक्षक दिवस के रूप में मनाएंगे तो उन्हें ज्यादा प्रसन्नता होगी। इसके बाद 1962 से उनके जन्मदिन 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में प्रत्येक वर्ष मनाया जाने लगा है।

       शिक्षक सिर्फ शिक्षक ही नहीं होता है, वरन् वह राष्ट्र-निर्माता भी होता है। वह केवल विद्यार्थियों को पढ़ाने का कार्य ही नहीं करता है, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का कार्य भी करता है। क्योंकि वह आज जिन नौनिहालों को शिक्षा प्रदान करता है, कल वे ही युवा बनकर देश की बागडोर संभालते हैं। हम कह सकते हैं कि शिक्षक देश के भविष्य को भी चित्रित करते हैं। प्राचीन समय में आश्रम और गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से गुरु अपने विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे। तब माता-पिता संतान को पूर्णरूपेण शिक्षाप्राप्ति तक गुरु को ही सुपुर्द कर देते थे, जहाँ से विद्यार्थी विद्याध्ययन पूर्ण होने पर ही गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता था। तब गुरु का स्थान अत्यंत सम्मानजनक माना जाता था। माता-पिता और ईश्वर से भी ऊपर गुरु का स्थान होता था। कबीर जी ने भी कहा है-

                           गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।

                           बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

       कबीरजी ने इस दोहे में गुरु को गोविंद अर्थात् ईश्वर से भी ऊँचा और महान बताया है। आधुनिक समय में शिक्षा का परिपेक्ष्य बदल गया है। अब गुरुकुल व्यवस्था नहीं है। विद्यार्थी रोज विद्यालय जाते हैं और रोज ही लौटकर वापस घर भी आते हैं। वर्ष 2020 का समय तो कोरोना महामारी के कारण शिक्षकों के लिए बहुत चुनौतियाँ लेकर आया है। कोरोना के कारण विद्यालय बंद हैं और विद्यार्थी एवं शिक्षक अपने घरों में हैं। ऐसे समय में शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए तकनीकी का सहारा लिया गया है। पुस्तक, श्यामपट्ट, और कक्षा का माहौल सबकुछ तकनीक द्वारा ही निर्मित करके रोचक ढंग से विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करना शिक्षकों के लिए आसान कार्य नहीं था। परंतु सभी शिक्षकों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए आपदा को अवसर में बदल दिया।

       मैंने यहाँ अवसर इसलिए कहा क्योंकि बहुत से मेरे शिक्षक भाई-बहन जिन्होने कभी व्हाट्सअप, गूगल आदि नहीं चलाया था, वे सभी अब सफलता-पूर्वक ऑनलाइन कक्षाएँ आयोजित कर पा रहे हैं। सभी अध्यापक-गण अब पीपीटी, वीडियो, ऑनलाइन परीक्षा, क्विज, असाइनमेंट आदि सरलता-पूर्वक करवाने में सक्षम हो गए हैं। इस तरह इस असामान्य माहौल को शिक्षकों द्वारा नवीन सामान्य (न्यू नॉर्मल) बनाने में अहम योगदान रहा है। अध्यापन कार्य में होने के कारण मैंने अपने शिक्षक भाई-बहनों को इन चुनौतियों से रूबरू होते बहुत नजदीकी से देखा और महसूस किया है। परंतु आज मैं अपने शिक्षिका होने पर गर्व करती हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि मैं एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी का हिस्सा हूँ। ईश्वर का कोटि-कोटि धन्यवाद है कि उन्होने मुझे इस कार्य के लिए चुना और इस भूमिका को अच्छी तरह निभाने का सामर्थ्य भी मुझे प्रदान किया।

                           शिक्षक है राष्ट्र-निर्माता, करता नव-निर्माण है।

                           देश की प्रगति देती, हरदम इसका प्रमाण है॥


                                            गुरवे नम: 



 
 



 
      

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