दोस्तों
! 14 सितंबर अर्थात् हिन्दी दिवस आनेवाला है। हिन्दी भारत की राजभाषा भी
है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हिन्दी को राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने
में मुख्य योगदान किसने दिया था ? ये थे भारतरत्न प्राप्त, उत्तरप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री और भारत के चौथे गृहमंत्री
पंडित गोविंद वल्लभ पंत, जिन्हें सभी जी.बी.पंत के नाम से भी जानते
हैं।
पंडित
गोविंद वल्लभ जी का जन्म ब्रिटिश भारत के अल्मोड़ा जिले के श्यामली पर्वतीय क्षेत्र
के गाँव खूँट में 10 सितंबर 1887 को हुआ था। यह क्षेत्र वर्तमान में उत्तराखंड में
स्थित है। इनके पिताजी का नाम श्री मनोरथ पंत और माताजी का नाम श्रीमति गोविंदी
बाई था। गोविंद वल्लभ जी पढ़ाई में बहुत तेज थे। इन्होने 1907 में म्योर सेंट्रल
कॉलेज, इलाहाबाद से बी.ए. में गणित, साहित्य और राजनीति
विषयों में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए। 1909 में यहीं से कानून की डिग्री भी
सर्वाधिक अंकों के साथ प्राप्त की। इसके लिए इन्हें कॉलेज की तरफ से ‘लेम्सडेन
अवार्ड’ भी दिया गया। अध्ययन के साथ-साथ ही इन्होने कांग्रेस के स्वयं
सेवक का कार्य करना भी शुरू कर दिया था। कानून की डिग्री लेने के बाद ये 1910 में
वापस अल्मोड़ा आ गए और यहाँ वकालत शुरू कर दी। इसके लिए ये पहले रानीखेत और इसके
बाद काशीपुर आ गए। यहाँ इन्होने ‘प्रेमसभा’ नामक संस्था का गठन किया
जिसका कार्य शिक्षा और साहित्य के प्रति जनता में जागरूकता पैदा करना था। ‘प्रेमसभा’
का कार्य इतने विस्तृत स्टार पर हुआ कि ब्रिटिश स्कूलों का तो काशीपुर से सूपड़ा ही
साफ अर्थात् पूरी तरह समाप्त हो गए।
गोविंद
वल्लभ जी ने स्वतन्त्रता संघर्ष में भी भाग लिया। वे गांधीजी से बहुत प्रभावित थे
और उन्हीं के कहने पर 1921 में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। 9 अगस्त 1925
को हुए प्रसिद्ध ‘काकोरी कांड’ के नवयुवकों के मुकदमे की
पैरवी के लिए पंत जी-जान से जुट गए थे। तब वे नैनीताल से स्वराज पार्टी के टिकट पर
लेजिस्लेटिव कौंसिल के सदस्य थे। इन्होने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक़ उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह को ‘ काकोरी कांड’ के लिए दोषी पाए जाने पर फाँसी की सजा रुकवाने का
भी भरसक प्रयास किया था। इसके लिए इन्होने पंडित मदन मोहन मालवीय जी और उस समय के
भारत के वायसराय लॉर्ड इरविन को पत्र भी लिखा, परंतु गांधीजी द्वारा
सहमति व समर्थन नहीं मिलने के कारण फाँसी टल न सकी। 1928 में आए ‘साइमन कमीशन’ का इन्होने पुरजोर बहिष्कार किया और 1930 के ‘नमक सत्याग्रह’ में भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इसके फलस्वरूप मई,
1930 में इन्हें देहारादून जेल में डाल दिया गया।
ब्रिटिश
भारत में वो दो बार संयुक्त प्रांत अर्थात यू.पी. के मुख्यमंत्री बने थे। पहली बार
17 जुलाई,1937-2 नवंबर, 1939 तक तथा पुन: 1 अप्रैल,1946-15
अगस्त, 1947 तक। भारत की आजादी के बाद जब 26 जनवरी 1950 को भारत का
संविधान लागू हुआ, तब स्वतंत्र भारत के संयुक्त प्रांत का नाम
परिवर्तित कर उत्तर प्रदेश रखा गया। इस नवनामित उत्तरप्रदेश राज्य का मुख्यमंत्री
एकबार पुन: सर्व सम्मति से इन्हें ही बनाया गया। 26 जनवरी, 1950-27 दिसंबर, 1954 तक ये उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री के
रूप में कार्यरत रहे।
गृहमंत्री पद पर रहते हुए जब लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल का निधन हुआ तो इन्हें
गृह मंत्रालय, भारत सरकार के प्रमुख की ज़िम्मेदारी दी गई। 2
मार्च, 1955-7 मार्च, 1961 तक ये भारत के चौथे गृहमंत्री रहे। गृहमंत्री पद पर रहते हुए ही 7 मार्च,
1961 को 73 वर्ष की आयु में इनका दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।
गृहमंत्री
रहते हुए ही इन्होने भारत को भाषा के अनुसार राज्यों में बांटना और हिन्दी को
राजभाषा के रूप में स्थापित करने जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए। इनके अतुलनीय योगदान
को देखते हुए ही 1957 में भारत सरकार द्वारा इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारतरत्न’ से सम्मानित किया गया। इनके नाम पर कई प्रसिद्ध
स्मारक और संस्थान हैं-
1.
गोविंद
वल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज,
उत्तरप्रदेश
2.
गोविंद
वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्व विद्यालय, पंतनगर, उत्तराखंड
3.
गोविंद
वल्लभ पंत अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड
4.
गोविंद
वल्लभ पंत सागर, सोनभद्र,
उत्तरप्रदेश
5.
पंडित
गोविंद वल्लभ पंत इंटर कॉलेज, काशीपुर,
ऊधमसिंह नगर, उत्तराखंड
इनके अलावा भी अनेक अस्पताल और शिक्षण संस्थाएं भी देशभर में कार्यरत हैं।


अत्यंत प्रेरणा दाई व्यक्तित्व का परिचय जो वर्तमान राजनीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है
जवाब देंहटाएंहां, वर्तमाकालीन राजनीति में ऐसे ही व्यक्तित्व की आवश्यकता है।🙏
हटाएंBhut hi achha vrnan...
जवाब देंहटाएंDhanyawad 🙏
हटाएंLesser known information...... good job👍
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएंLesser known information...... good job👍
जवाब देंहटाएंThanks
हटाएं👍👍👌 nice post and very informative
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