दोस्तों ! ‘अर्थ डे’ अर्थात् ‘पृथ्वी दिवस’ आप सभी ने सुना है, लेकिन क्या आपने ‘अर्थ ओवरशूट डे’ का नाम सुना है ? हम में से शायद 50% से भी अधिक लोग इसके बारे में नहीं जानते होंगे। ‘अर्थ ओवरशूट डे’ अर्थात् साल का वह दिन जब मनुष्य ने पृथ्वी द्वारा उपलब्ध कराए गए पूरे साल के संसाधनों का इस्तेमाल पूरा कर लिया हो। पूरे साल के लिए उपलब्ध संसाधनों का अर्थ हम सामान्य भाषा में इस तरह समझ सकते हैं कि- हमने अपना जो एक साल का बजट निर्धारित किया था, उसको 7-8 महीनों में ही खर्च कर दिया अथवा अपने 1 महीने के निर्धारित बजट को 20 दिन में ही पूरा खर्च कर दिया। अब बचे हुए साल के 4-5 महीने अथवा महीने के 10 दिन का खर्चा हमें कुछ और जरूरतों में से काट कर या अगले साल के बजट में से या फिर किसी और से उधर या लोन लेकर चलाना पड़ेगा।
अब मैं सोचती हूँ कि सभी को ‘अर्थ ओवरशूट डे’
का मतलब समझ आ गया होगा। इसका मतलब समझने के बाद इसकी गंभीरता भी समझ में आ ही गई होगी।
‘अर्थ ओवरशूट डे’ प्रत्येक वर्ष अलग-अलग तारीख को आता है। 2019 में यह
29 जुलाई को ही आ गया था। इस साल 24 दिन बाद यानि 22 अगस्त को आया है। 24 दी बाद आने
का मतलब है कि इस वर्ष हमने संसाधनों के प्रयोग में थोड़ी सावधानी बरती है,
परंतु इसका श्रेय लेकर खुश होने कि आवश्यकता नहीं है,
क्योंकि यह सब ‘कोरोना महामारी’ और उसके कारण लगने वाले ‘लॉक
डाउन’ की वजह से हुआ है, जब दुनिया भर के लोग घरों में रहने को मजबूर हो गए।
साल 1970 से हर वर्ष ‘अर्थ ओवरशूट डे’ पीछे ही जाता जा रहा था। इस
वर्ष कोरोना महामारी के कारण 24 दिन आगे बढ़ा है, परंतु क्या हम ‘अर्थ
ओवरशूट डे’ की रेटिंग सुधारने के लिए कोरोना महामारी जैसी कीमत
चुकाएंगे ?
नहीं ! कदापि नहीं ! यह कीमत मनुष्य को बहुत महंगी पड़ेगी,
तो क्यों ना हम स्वयं ही इसके लिए जागरूक हों और कुदरत को स्वयं निर्णय नहीं लेना पड़े
कि वो प्रकृति का अनुपात अपने ढंग से ठीक करे। यदि हम समय रहते जागरूक नहीं हुए तो
प्रकृति का स्वयं का तरीका रौद्र है, जो मनुष्य को बहुत भारी पड़ेगा। ‘अर्थ
ओवरशूट डे’ का आयोजन प्रसन्नता प्रकट करने के लिए नहीं किया जाता
है, बल्कि यह एक अत्यंत गंभीर और शोचनीय विषय है कि जिन संसाधनों को
हमें 31 दिसंबर तक प्रयोग करना था, वो हमने इस वर्ष 22 अगस्त को ही समाप्त कर दिए हैं।
मनुष्य चाहे तो इनमें से कुछ आदतों को अपना कर धीरे-धीरे ही सही,
पर इसमें कुछ सुधार अवश्य कर सकता है। जैसे-
1.
अगर मांसाहार
को आधा कर शाकाहार पर ज़ोर दिया जाए तो इसमें 5 दिन का सुधार संभव है।
2.
खाने की
बर्बादी को 50% तक कम किया जाए तो इसमें 11 दिनों का सुधार संभव है।
3.
जनसंख्या
कम करने के लिए यदि हर परिवार में 1 बच्चा कम हो तो 2050 तक 100 करोड़ लोग कम होंगे
और 30 दिनों का सुधार हो सकता है।
4.
इको फ्रेंडली
बसें, कारें, स्कूटर
और साइकल प्रयोग करना तथा पैदल चलने को बढ़ावा दें तो 12 दिनों तक का सुधार संभव है।
5.
प्रत्येक
व्यक्ति को हर साल कम से कम 5 पेड़ अवश्य लगाने चाहिए।
यदि समय रहते उपर्युक्त उपाय नहीं अपनाए गए तो 2030 तक दो पृथ्वी
जितने संसाधनों की आवश्यकता पड़ेगी। इनकी पूर्ति के लिए मनुष्य फिर कोई अत्याधुनिक तरीका
बताकर प्रकृति से खिलवाड़ करेगा। फिर इसका खामियाजा भुगतने के लिए कुदरत का कोई नया
कहर ना आ जाए !
कुदरत का जो तुम करोगे सम्मान, तभी रखेगी ये तुम्हारा मान।
आधुनिकता की अंधी दौड़ में तुम, ना भूलो जान है तो है जहान॥

पृथ्वी बचाकर मनुष्यता की रक्षा करें

पृथ्वी के संसाधनों के प्रति जागरूक करने के लिए धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंDhanyawad
हटाएं👌👌🙏🙏
जवाब देंहटाएंDhanyawad
हटाएंI accept - mujhe is baare m koi jankaari nhi thi. Maine to iske baare m suna bhi nhi tha.
जवाब देंहटाएंIs information ko share krne k liye Thank You
Ha bahut se logo ko iske bare me nhi pta h
हटाएं५०% ही क्यों मुझे तो लगता है ८०% लोग अनभिज्ञ एवं ९५% लापरवाही अर्थात जान कर भी लापरवाही कहते हैं जिसका परिणाम समस्त विश्व भोग ही रहा है तो ऐसी नवजागरणकालीन समय में भी न संभले तो लेख में दुष्परिणाम चेतावनी भी दी है जो कि स्तुत्य है।
जवाब देंहटाएंहां इस लापरवाही को छोड़कर लोग जागरूक हों, इसी कोशिश के लिए लेख सभी तक पहुंचने का छोटा सा प्रयास किया है।🙏
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