ॐ गं गणपतये नमो नम:, सिद्धि विनायक नमो नम:।
अष्ट विनायक नमो नम:, गणपति बप्पा मोरया॥
दोस्तों! आज गणेश चतुर्थी है। यह त्योहार भारत में 10 दिनों
तक धूमधाम से मनाया जाता है। यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से प्रारम्भ होकर भाद्रपद
अनंत चतुर्दशी को गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ समापन होता है। पुराणों के अनुसार
शिव और पार्वती के पुत्र गणेश जी का आज ही के दिन अवतरण हुआ था। इन्हें मंगलमूर्ति,
प्रथम देव, विघ्नहर्ता, बुद्धि-विधाता आदि अनेक नामों से जाना जाता है। इन्हें
गणपति भी कहा जाता है। गणपति नाम ‘गण+पति’ शब्दों को जोड़कर बना है अर्थात् गणों के स्वामी। इन्हें
गणेश भी कहा जाता है, ‘गण+ईश’ अर्थात् गणों के ईश्वर।
गणेश चतुर्थी के उत्सव को गणेशोत्सव कहा जाता है। वैसे तो
इस उत्सव की धूम सम्पूर्ण भारत में रहती है, परंतु सर्वाधिक धूमधाम महाराष्ट्र में होती
है। महाराष्ट्र में भी पुणे का उत्सव विश्व प्रसिद्ध है। कहते हैं यहाँ कस्बा
गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति जी की स्थापना छत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई ने की थी।
महाराष्ट्र में गणपति जी को मंगलकारी देवता के रूप में पूजा जाता है और ‘मंगलमूर्ति’ के नाम से पुकारा जाता है। दक्षिण भारत में ये ‘कला-शिरोमणि’ के रूप में लोकप्रिय हैं। मैसूर तथा तंजौर के मंदिरों
में गणेश जी की नृत्य करती हुई मुद्रा में अनेक मनमोहिनी मूर्तियाँ हैं। हिन्दू धर्म
में गणेश जी को प्रथम देव के रूप में पूजा जाता है। कोई भी धार्मिक उत्सव या शुभ कार्य
हो, सर्वप्रथम गणेश-पूजा ही सम्पन्न करवाई जाती है।
महाराष्ट्र में सातवाहन, राष्ट्रकूट, चालुक्य आदि राजवंशों द्वारा गणपति पूजा की प्रथा प्रारम्भ की गई
थी। वीर छत्रपति शिवाजी महाराज भी गणपति
पूजा करते थे। महाराष्ट्र के पेशवाओं ने गणपति पूजा को बढ़ावा दिया। पेशवाओं के समय
गणेशोत्सव प्रसिद्ध तो था परंतु जन-जन उसमें भाग नहीं ले सकता था,
क्योंकि समाज में छुआछूत बुरी तरह से फैला हुआ था। इसलिए शूद्र जाति के लोग गणेश प्रतिमा
के चरण-स्पर्श नहीं कर सकते थे, मंदिरों में प्रवेश वर्जित था। लोकमान्य बाल गंगाधर
तिलक ने इस उत्सव को जन-जन का उत्सव बनाया। इन्होने गणेशोत्सव को राष्ट्रीय एकता
का प्रतीक बना दिया। इन्हीं के प्रयासों से जो गणेश-पूजा परिवार तक सीमित थी,
वह एक सार्वजनिक महोत्सव में परिवर्तित हो गई। इससे आजादी की लड़ाई में और अस्पृश्यता
को दूर कर समाज को संगठित करने में सहयोग मिला। इसने आम आदमी का देश के प्रति ज्ञानवर्धन
कर, उसे अपने में शामिल कर, एक आंदोलन का रूप ले लिया। इतिहास गवाह है कि इस आंदोलन
का ब्रिटिश साम्राज्य की नींव कमजोर करने में बहुत बड़ा हाथ रहा है।
1893 में जब बाल गंगाधर ने इस उत्सव को प्रारम्भ किया तो जन-आंदोलन
में खुशी की लहर दौड़ गई थी। 10 दिन की पूजा और उत्सव की पश्चात जब गणपति प्रतिमा को
पुन: मंदिर में स्थापित करने की बारी आई तो मंदिर के पुजारियों ने इसका विरोध किया।
उनका कहना था कि अछूतों द्वारा छूने के पश्चात प्रतिमा को पुन: मंदिर में स्थापित नहीं
किया जा सकता। तब की स्थिति को देखते हुए यह मुद्दा बड़ा रूप न ले,
इसलिए यह तय किया गया कि इसे समुद्र में विसर्जित कर दिया जाए। तभी से यह परंपरा चल
पड़ी कि गणेश-चतुर्थी पर लोग नई मूर्ति खरीद कर 2, 4,
5, 7 या 10 दिन के लिए स्थापित करते हैं,
तत्पश्चात पानी में इसका विसर्जन कर दिया जाता है।


गणेशोत्सव के बारे में उत्तम जानकारी देता आलेख है।
जवाब देंहटाएंDhanyawad
हटाएंGanpati Bappa morya
जवाब देंहटाएंCorona h pr hm ghar pr rhkr hi bhagwan ki aaaradhna karenge🙏
Ha yahi krna h or sabko btana bhi h
हटाएंगणपति गजानन्द महाराज की भारतीय आधुनिक काल की ऐतिहासिक जानकारियों को बताता देशसेवा एवं देव पूजा का महत्व बताया सुंदर आलेख। गं गणपतये नमः
जवाब देंहटाएं🙏🙏🇮🇳🇮🇳
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