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बुधवार, 19 अगस्त 2020

रणथंभौर की रानी – मछली

       आज हम बात कर रहे हैं, रणथंभौर की रानी – मछली की। अब आप कहेंगे कि मछली जल कि रानी सुनी थी, पर रणथंभौर की रानी मछली! कैसे ? दोस्तों ! चौंकिए मत, क्योंकि हम रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान की रानी मछली की बात कर रहे हैं। नहीं समझे ना ! आपकी उलझन बिलकुल सही है, आपको लग रहा है कि रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान की रानी मछली कैसे हो सकती है ? चलिए मैं आपकी हैरानी का अंत करती हूँ और कहानी से पर्दा उठाती हूँ। दोस्तों ! यह सच है कि यह कहानी रणथंभौर की रानी मछली की ही है, परंतु यह मछली जलीय प्राणी नहीं बल्कि जंगल की रानी एक बाघिन की कहानी है।

       जी हाँ दोस्तों ! इस मछली बाघिन का जन्म राजस्थान के सवाई माधोपुर में वर्ष 2016-17 में हुआ था। यह बंगाल टाइगर प्रजाति की बाघिन मछली थी। इसे मछली नाम इसकी माँ के चेहरे पर मछली जैसा विशेष निशान होने के कारण दिया गया। मछली अपने अलग नाम की ही तरह सामान्य बाघों से अलग काम के कारण भी प्रसिद्ध रही। इसकी कई विशेषताएँ थीं, जिनके कारण इसे भारत की ही नहीं विश्व की सबसे प्रसिद्ध बाघिन भी माना जाता है। इसने अपने जन्म के 2 वर्ष बाद ही स्वयं शिकार करना आरंभ करके अपनी माँ का क्षेत्र ग्रहण कर लिया। इसने एक साथ 11 शावकों को जन्म देकर भी प्रसिद्धि प्राप्त की। इन 11 शावकों में 7 मादा और 4 नर शावक थे। इनमें से 2 मादा शावकों को सरिस्का टाइगर रिजर्व में शिफ्ट करके वहाँ भी बाघों की संख्या में सफलता पूर्वक वृद्धि की गयी । अपने शिकार कौशल और ताकत के कारण भी वह प्रसिद्ध हुई। एकबार वर्ष 2003 में उसने 10 फुट लंबे मगरमच्छ के साथ अपने शावकों को बचाने के लिए लड़ाई की और अंत में उसे मार डाला। वह अपने शावकों और नर बाघों को खतरे से बचाने के लिए भी जानी जाती थी।

       सामान्य तौर पर वह शांत स्वभाव और कैमरे के प्रति विशेष लगाव रखती थी। इसी कारण वह कई वर्षों तक रणथंभौर नेशनल पार्क के आकर्षण का केंद्र और शान बनी रही। उसकी प्रसिद्धि और चाहत के चर्चे यहाँ तक पहुँच गए कि इसके नाम का फेसबुक पेज भी रहा है। मछली को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड भी मिल चुका है। भारत सरकार ने इस पर डाक टिकट भी जारी किया है। जब तक यह जिंदा थी तब तक प्रत्येक वर्ष लगभग 65 करोड़ रुपए का बिजनेस देती थी। दुनिया में अब तक सबसे ज्यादा फोटो भी मछली के ही खींचे गए हैं। अपने जीवन के अंत में इसने अपने शिकारी दाँत खो दिए जिसके कारण पार्क के कर्मचारियों द्वारा ही इसे भोजन दिया जाता था। अंत मे 18 अगस्त 2016 में मछली के जीवन का अंत हो गया और हिन्दू रीति-रिवाज के साथ इसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

      टाइगर क्वीन नाम से इस पर 50 मिनट की डोक्यूमेंट्री फिल्म भी बनी थी। मछली की कहानी को बीबीसी के नेचुरल वर्ल्ड में क्वीन ऑफ टाइगर्स: नेचुरल वर्ल्ड स्पेशल नाम से एक एपिसोड में प्रसारित किया गया था। दक्षिण भारतीय फिल्म निर्माता एस. नल्लमुथु द्वारा द वर्ल्ड्स मोस्ट फेमस टाइगर शीर्षक वाली फिल्म बनाई गई, जिसमें मछली और इसकी बेटी सुंदरी के भी शॉट्स हैं। रॉयल बंगाल टाइगर की आयु 10-15 वर्ष होती है, परंतु मछली का जीवन 20 वर्ष का रहा। इस लिहाज से यह सबसे ज्यादा समय तक जीवित रहने वाली बाघिन भी बनी। यह अनेक नामों से प्रसिद्ध हुई, जैसे- टाइगर्स की रानी मदर, रणथंभौर की टाइग्रेस क्वीन, झीलों की रानी, क्रोकोडायल किलर आदि।

                                                                

                  रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान की शान- मछली      


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