‘दान’ किसी भी प्रकार का हो उत्तम ही होता है, उस पर यदि यह ‘अंगदान’ हो तो सर्वोत्तम बन जाता है। किसी जीवित या मृत मनुष्य के शरीर का कोई ऊतक या अंग किसी दूसरे मनुष्य को दिया जाता है, तो उसे अंगदान कहा जाता है। आज ’13 अगस्त विश्व अंगदान दिवस’ है। इस दिवस को मनाने का प्रमुख उद्देश्य लोगों में मृत्यु के बाद अंगदान करने के लिए जागरूकता लाना है। यदि सभी लोग इसके लिए जागरूक हों तो, अनेक लोगों की जान बचाई जा सकती है। कई लोगों को जीवनदान दिया जा सकता है। मानव-अंगों की अवैध तस्करी बंद हो सकती है। जरूरतमन्द व्यक्ति को अंग-प्रत्यारोपण के लिए बहुत बड़ी रकम के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा। प्रत्यारोपण के लिए अंगों की कमी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बहुत से लोग बड़ी रकम का इंतजाम नहीं कर पाते हैं, और उचित समय पर अंग-प्रत्यारोपण एवं इलाज के अभाव में कई जिंदगियाँ दम तोड़ देती हैं।
अंगदान और प्रत्यारोपण ‘मानव अंग प्रत्यारोपण अधिनियम (THOA) 1994’ के अंतर्गत आता है, जो फरवरी 1995 से लागू
हुआ। भले ही यह अधिनियम 1995 में लागू हुआ हो, परंतु भारतीय संस्कृति में
तो प्रारम्भ से ही सेवा, त्याग, दान आदि की परंपरा रही है। पुराणों के उल्लेखानुसार
महर्षि दधीचि का देहदान उसी त्याग, दान और सेवा का अनुपम उदाहरण है। जिसमें देवराज इन्द्र
द्वारा वृत्रासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए महर्षि दधीचि की अस्थियों की प्रार्थना
की जाती है। त्याग की मूर्ति महर्षि दधीचि लोक-कल्याणार्थ अपनी देह का दान कर देते
हैं। अंत में जब वे मात्र अस्थियों का ढाँचा ही शेष रहते हैं,
तब उनसे धनुष का निर्माण करके देवराज इन्द्र द्वारा वृत्रासुर का वध करके सभी प्राणियों
को उस राक्षस से मुक्ति मिलती है।
ऐसे महर्षि दधीचि की सेवामयी परंपरा का आज बहुत कम लोग ही अनुगमन
करते दिखाई देते हैं, भारत में तो यह बहुत ही अल्प मात्रा में है। हमारे
देश में प्रति 10 लाख लोगों में मात्र 0.16 लोग ही अंगदान करते हैं,
जो बहुत ही कम है। जबकि यहाँ प्रति वर्ष 1 लाख से अधिक सड़क-दुर्घटनाएँ होती है,
जिनमें से अधिकांश मौत मस्तिष्क आघात के कारण होती हैं। अगर सड़क दुर्घटनाओं में मरने
वाले सभी लोगों का अंगदान किया जाए तो भारत में प्रत्येक वर्ष कम-से-कम 5 लाख जीवन
बचाए जा सकते हैं।
आइए, आज हम सब प्रतिज्ञा लें कि ‘अपने देश की त्यागमयी प्रवृत्ति और महर्षि दधीचि द्वारा प्रारम्भ
की गई इस बेमिसाल परंपरा में हम भी अपना योगदान देंगे और अधिक-से-अधिक लोगों को अंगदान
के लिए जागरूक और प्रेरित करेंगे।‘


रक्तदान और अंगदान महादान है
जवाब देंहटाएंअत्यन्त प्रेरक लेख
धन्यवाद
हटाएंउत्तम विचार
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंत्याग एवं अंगदान के बारे में जानकारी मिलती है। लोगों को अपने लेखों से इसी तरह जागरूक करते रहें।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंभारतीय त्याग परम्परा का परिचय देता सुंदर आलेख है।
जवाब देंहटाएंDhanyawad
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