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रविवार, 19 जुलाई 2020

१८५७ की क्रांति के जनक- मंगल पांडेय

    भारत करीब २०० वर्षों तक अंग्रेजों की गुलामी के बाद १५ अगस्त १९४७ को आजाद हुआ। १५ अगस्त १९४७ को क्या भारत को अचानक से आजादी मिल गयी थी ? नहीं ! इसके लिए हमारे देशभक्तों ने जान गंवाई, तब जाकर हमने यह आजादी पाई। १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के बारे में हर भारतीय जानता है।  यदि उस समय सभी राजा, रियासतें साथ देती तो हमें आजादी १९४७ में नहीं बल्कि उससे ९० वर्ष पहले १८५७ में ही मिल चुकी होती। परन्तु चंद लोगों के निजी स्वार्थ, असहयोग व विश्वासघात के कारण हमें इसे प्राप्त करने के लिए अनेक रण-बांकुरों की कुर्बानी देनी पड़ी, जिसमें ९० वर्ष और लग गए।

    परन्तु क्या आप जानते हैं कि १८५७ के आंदोलन से पहले ही भारतीयों के हृदयों में देशभक्ति की भावना हिलोरें लेने लगी थी। देश अंग्रेजों के चंगुल से आजाद होना चाहता था। देशभक्तों के दिलों में चिंगारी सुलग रही थी, और उस चिंगारी को बस थोड़ी सी हवा की ही आवश्यकता थी। जब इस चिंगारी को हवा मिली तो इतिहास प्रसिद्ध १८५७ का विद्रोह हुआ। विद्रोह का कारण था वह आधुनिक एनफील्ड बन्दूक, जो सिपाहियों को दी गयी थी। क्योंकि उसमें जो कारतूस भरे जाते थे उनके बाहरी आवरण को दांतों से काटकर भरना पड़ता था। उस बाहरी आवरण में चर्बी लगी थी जो गाय और सूअर के मांस की बनी थी। यह हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को अत्यंत आहत करने वाला था।

    इसी के विरोध में मंगल पांडेय नामक एक पंडित सिपाही ने अपने साथियों को खुला विद्रोह करने के लिए कहा। परन्तु सभी ने अंग्रेजो के डर से इंकार कर दिया। तब इसके विरोध में २९ मार्च १८५७ को बैरकपुर परेड मैदान कलकत्ता के निकट सिपाही मंगल पांडेय ने रेजिमेंट के अफसर लेफ्टिनेंट बाग पर हमला कर उसे घायल कर दिया। इसके लिए जब सिपाहियों से अंग्रेजों द्वारा उसे गोली मारने के लिए कहा गया तो सभी सिपाहियों ने उसे मारने से मना कर दिया। इसके बाद मंगल पांडेय को बंदी बना लिया गया और ६ अप्रैल १८५७ को उसका कोर्ट-मार्शल कर ८ अप्रैल १८५७ को जवानी में ही फांसी दे दी गयी। परन्तु इनकी फांसी के साथ यह विद्रोह यहीं समाप्त नहीं हुआ। यह तो सिर्फ शुरुआत भर थी। इसके पश्चात के १८५७ के स्वतंत्रता संग्राम के बारे में बच्चा-बच्चा  जानता है।

    मंगल पांडेय का जन्म १९ जुलाई १८२७ को उत्तरप्रदेश के बलिया में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कुछ लोग इनका जन्म ३० जनवरी १८३१ को भी मानते हैं। ये युवावस्था में ही सेना में भर्ती हो गए थे। देशभक्ति इनमें कूट-कूट कर भरी हुई थी, इसीलिए ब्राह्मण परिवार से होते हुए भी ये सेना में  भर्ती हुए थे। इनकी देशभक्तो का जज्बा १८५७ के विद्रोह के रूप में सभी के सामने आ ही गया था। आइये हम सब नमन करते हैं क्रांतिकारी मंगल पांडेय को, जो भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम महानायक बने।

                                वन्दे मातरम्

                                                                सीमा शर्मा

Mangal Pandey 'The Lone Runner' - Demokratic Front
मंगल पांडेय


6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही प्रेरणादायक प्रसंग है जिसको पढ़ कर देशभक्ति की वह पंक्ति स्मरण हो आई " हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के" वन्देमातरम्-नमस्कार।

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  2. अगर सभी राजा 1857 में ही सहयोग करते तो हमें इतने सालों तक गुलामी नहीं सहन करनी पड़ती.....Jai Hind - Jai Bharat🇮🇳

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  3. Swatantrata sangram ke nayak ke bare men jankari deti achhi post hai.

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