गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
हिंदी पञ्चाङ्गानुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु-पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु की विशेष पूजा की जाती है, और सामर्थ्यानुसार सभी अपने गुरु को भेंट या उपहार भी श्रद्धापूर्वक अर्पण करते हैं। वर्षा-ऋतु का प्रारम्भ भी इसी दिन से होता है।
गुरु शब्द 'गु' और 'रु' को जोड़कर बना है। यहाँ 'गु' का अर्थ - अंधकार या अज्ञान है, और 'रु' का अर्थ - उसका निरोधक अर्थात् उसे मिटाने वाला है। इस तरह 'गुरु' शब्द का अर्थ ही अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाने वाला है। कहा भी गया है-
'अज्ञान तिमिरांधश्च ज्ञानांजन शलाकया।
चक्षुन्मीलितं तस्मै श्री गुरवे नमः।।
महाभारत रचयिता महर्षि व्यास जी का जन्मदिन भी आज ही के दिन आता है। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे और उन्होंने ही वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन भी किया था। इसी कारण इनको वेदव्यास भी कहा जाता है। इन्हें आदिगुरु भी माना जाता है। गुरु-पूर्णिमा को व्यास-पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है।
लेख के प्रारम्भ में श्लोक के माध्यम से गुरु को त्रिदेवों के समान बताते हुए उन्हें प्रणाम किया गया है, क्योंकि यदि गुरु न हो तो ईश्वर अर्थात् सत्य की पहचान भी संभव नहीं है। कबीरजी भी एक दोहे के माध्यम से यही बताने की चेष्टा कर रहे हैं-
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाय।
बलिहारी गुरु आपके, गोविन्द दियो बताय।
अर्थात् कबीरजी कहते हैं कि मेरे सामने गुरु और ईश्वर/गोविन्द दोनों खड़े हैं, मैं पहले किसकी चरण-वन्दना करूँ ? हे गुरुदेव! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ , क्योंकि आपने ही तो मेरा ईश्वर/गोविन्द से परिचय करवाया।
गुरु-पूर्णिमा को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाना चाहिए, क्योंकि एक बच्चे को जीवन तो माता-पिता द्वारा प्राप्त होता है, परन्तु उस जीवन के लिए सही मार्ग बताने वाला गुरु ही होता है। कहा भी गया है-
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।
अर्थात् हे गुरुदेव! आप हमें असत्य से सत्य के मार्ग की ओर ले जाइए, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाइए तथा मृत्यु से अमरता की ओर ले जाइए।
गुरु की महिमा को दर्शाते हुए कबीरदास जी कहते हैं "हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर" अर्थात् भगवान के रूठने पर तो गुरु की शरण में जाकर रक्षा संभव है परन्तु गुरु के रूठने पर कहीं भी ठिकाना नहीं है, सारे द्वार बंद हो जाते हैं।
अतः सभी को अपने गुरु का आदर एवं सम्मान करना चाहिए।
।।ॐ श्री गुरवे नमः।।
सीमा शर्मा
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| ।।ॐ श्री गुरवे नमः।। |


प्रेरक प्रसंग
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
जवाब देंहटाएं🙏🙏
जवाब देंहटाएंDhanywad
हटाएंGuru hmesha pujaniy hote hai.achhi post hai.
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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