भारत के ‘राष्ट्रीय पशु बाघ’ को तो आप जानते ही हैं। परंतु क्या आप जानते हैं कि हमारे राष्ट्रीय पशु का जीवन अभी संकट में है, क्योंकि इनकी संख्या अब बहुत कम रह गई है। मनुष्य द्वारा जंगलों को कम करने और अवैध रूप से इनका शिकार करने के कारण इनके जीवन पर यह संकट छाया है। भारत में बाघों कि गिरती संख्या को देखते हुए 1973 में ‘बाघ परियोजना’ शुरू की गई। इस परियोजना का उद्देश्य बाघों का संरक्षण करना था। इसके तहत बाघों के 27 आरक्षित क्षेत्रों की स्थापना की गई, जिनमें 37,761 वर्ग किलोमीटर एरिया आता है।
बाघ पूरी दुनिया में पाए जाते हैं। इसलिए बाघों की घटती संख्या को
देखकर पूरी दुनिया का चिंतित होना भी स्वाभाविक है। इसी चिंता के कारण 29 जुलाई,
2010 को सेंट पीटर्सबर्ग में ‘टाईगर समिट’ का आयोजन किया गया था,
जिसमें साल का एक दिन ’29 जुलाई’ बाघों के नाम समर्पित किया गया। तभी से प्रत्येक वर्ष
29 जुलाई को ‘अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस’ मनाया जाता है। इसका उद्देश्य बाघों के आवास-स्थल को बढ़ावा देना
और उनके संरक्षण के लिए जागरूकता फैलाना है। यदि इनकी संख्या को बढ़ाने पर ध्यान नहीं
दिया गया तो ये बहुत जल्दी समाप्त हो जाएंगे। इनकी समाप्ती पूरी दुनिया और पर्यावरण
के लिए शुभ संकेत नहीं है।
29 जुलाई को दुनिया भर में बाघों से संबन्धित आंकड़ों को साझा किया
जाता है। हमारे यहाँ भारत में प्रत्येक 4 वर्षों के अंतराल पर बाघों की गणना की जाती
है। 2006 में इनकी संख्या 1,411, 2010 में 1,706, 2014 में 2,226 और 2018 में 2,967 हो गई थी। अगली गणना 2022
में होगी। आंकड़ों पर नजर डालें तो इनकी संख्या में पिछले 15 सालों में कुछ वृद्धि दर्ज
की गई है, जो एक सराहनीय प्रयास है।
पहले 1915 में इनकी संख्या एक लाख थी। अभी दुनिया में सिर्फ 6,000 बाघ ही बचे हैं, जिनमें से 3,891
बाघ अकेले भारत में हैं। बीती एक सदी
में बाघों की लगभग 97% आबादी समाप्त प्राय हो चुकी है। बाघों की 9 प्रकार की प्रजातियों
में से 3 प्रजातियाँ पूर्णरूपेण विलुप्त हो चुकी हैं। वर्तमान में केवल 6 प्रजातियों
के अस्तित्व को जिंदा रखने की लड़ाई सम्पूर्ण विश्व लड़ रहा है,
जिसमें भारत अग्रणी है। समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो इन 6 प्रजातियों की विलुप्तता
भी निश्चित है। भारत में सबसे ज्यादा बाघ क्रमशः मध्य प्रदेश,
कर्नाटक और उत्तराखंड में पाए जाते हैं।
बाघों को बचाकर हम पर्यावरण को भी समृद्ध बनाते हैं। प्रधानमंत्री
श्री नरेंद्र मोदी जी ने कहा था कि ‘भारत और भारतीय संस्कृति तो वैदिक युगों से ही सह-अस्तित्व
की शिक्षा देती आई है।‘ हमारे तो सभी देवी-देवताओं के साथ भी पशु-पक्षी जुड़े
हुए हैं, जैसे- शिवजी के साथ सर्प और बैल, माँ दुर्गा के साथ सिंह,
गणेशजी के साथ हाथी और चूहा,
कार्तिकेय के साथ मोर, विष्णु जी के साथ शेषनाग और गरुड़,
लक्ष्मी जी के साथ उल्लू, कृष्ण जी के साथ गाय,
सरस्वती जी के साथ हंस, हनुमान जी के साथ बंदर आदि। इसलिए हमें तो पशु-पक्षियो
के साथ स्नेह-पूर्वक सामञ्जस्य रखते हुए जीने की कला पुरातन काल से ही हमारे पूर्वजों
द्वारा सिखाई गई है, अब बस हमें उसे फिर से अमल में लाने की आवश्यकता है।
आइए, आज 29 जुलाई को अंतराष्ट्रीय बाघ दिवस पर हम बाघों
के संरक्षण के प्रति सबको जागरूक करें और अपने राष्ट्रीय पशु बाघ एवं पर्यावरण के संरक्षण
में अपना छोटा सा सार्थक सहयोग करें।
सीमा शर्मा
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| बाघ को बचाकर पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान करें। |


जीव से शिव मार्ग का प्रथम पाठ जैसा सुंदर आलेख
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंबाघ संरक्षण के साथ ही सत्य सनातन धर्म के बारे में उत्तम जानकारी मिलती है।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंThis will generate awareness....nice effort 👍
जवाब देंहटाएं👍👍✌️✌️
जवाब देंहटाएं🙏🙏🙏🙏🙏
हटाएंप्रकृति से छेड़छाड़ का नतीजा ही है कि बाघों की तीन प्रजाति पूर्णरूपेण लुप्त हो चुकी है । प्रकृति को बचाना है तो वनों व बाघों का संरक्षण बहुत जरूरी है ।
जवाब देंहटाएंसत्य वचन
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