कर्मशीलता और भाग्यवादिता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दरअसल ये दोनों साथ- साथ ही चलते हैं, अर्थात् ये एक दूसरे के पूरक हैं। कई बार हम अपने चारों तरफ़ देखते हैं कि कुछ लोग यह सोचकर कि वे तो मनहूस या दुर्भाग्यशाली हैं, कर्म करना ही छोड़ देते हैं। कर्म करना छोड़ने पर मनुष्य कभी भी सफल नहीं हो सकता है। प्रत्येक मनुष्य को जीवन में सफल होने के लिए कर्म करना ही पड़ता है। सफलता किसी को यूं ही नहीं मिलती। इसलिए कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि उसका फल देर- सवेर अवश्य प्राप्त होता है। हमारे पूर्वजों द्वारा भी कहा गया है कि कर्मशील मनुष्य अपने कर्मों द्वारा अपनी भाग्यरेखा स्वयं ही बना और बदल सकता है।
संस्कृत के एक श्लोक में भी कहा गया है कि-
उद्यमेन हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
अर्थात् परिश्रम करने से ही सभी कार्य सिद्ध होते हैं, केवल सोचने से नहीं। जिस तरह सोते हुए शेर के मुख
में हिरण स्वयं प्रवेश नहीं करेगा, इसके लिए उसे
शिकार करने की मेहनत करनी पड़ती है।
इसलिए मनुष्य को अपने सोए भाग्य को जगाने के लिए कर्म करते
रहना आवश्यक है।

बिल्कुल सही अपने कर्म से हम अपना भाग्य बाट सकतेहैं।
जवाब देंहटाएंJI BILKUL SAHI KHA AAPNE, DHANYWAD
हटाएंसत्य सनातन संस्कृति का सिद्धान्त।
जवाब देंहटाएंDHANYWAD
हटाएंKarm karne wale ki Ishwar bhi sahayta karte h
जवाब देंहटाएंBILKUL SAHI KHA AAPNE
हटाएं|| साहसे श्री लभते ||
जवाब देंहटाएंSATYA VACHAN
हटाएंसटीक
जवाब देंहटाएंDHANYWAD
हटाएंShri Krishna Ji ne bhi kaha h - "Karm kare jao, fal ki chinta mt kro"
जवाब देंहटाएंSHI KHA AAPNE
हटाएंहाथ की लकीरों के फकीर न होना ऐ दोस्त!
जवाब देंहटाएंकिस्मत तो उनकी भी होती है, जिनके हाथ नहीं होते ।😎
ATYANT SUNDAR UDAHARAN
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