संधि अर्थात् जोड़। सामान्य शब्दों में संधि का यही अर्थ होता है। परन्तु गहराई में जाएँ तो इसके अनेक अर्थ होते हैं, जैसे शरीर में विभिन्न हड्डियों के जोड़, भाषा के व्याकरण का एक भाग या अध्याय, दो या दो से अधिक लोगों, समूहों या देशों के बीच किसी बात का समझौता होना, किसी अनंत युद्ध को समाप्त करने के लिए कुछ शर्तों के साथ एक समझौता या एक पक्ष का आत्मसमर्पण आदि।
यहाँ हम जिस ऐतिहासिक विशिष्ट घटना की बात कर रहे हैं, वह है - वर्साय की संधि। इतिहास के विद्यार्थियों ने तो इसे विस्तार रूप से पढ़ा ही होगा। प्रथम विश्व युद्ध का नाम भी सभी ने सुना ही है। यह 1914 - 1919 के इतिहास की ऐसी घटना थी जिसमें एक-एक करके विश्व के 37 देश कूद पड़े थे। धीरे-धीरे यह एक ऐसे युद्ध में परिवर्तित हो गया जिसे दुनिया प्रथम विश्व युद्ध के रूप में जानती है। प्रथम विश्व युद्ध ऐसे युद्ध में बदलता जा रहा था, जो समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अंत में जर्मनी ने कुछ शर्तों के साथ आत्म समर्पण किया और फिर 28 जून 1919 को वर्साय की संधि पर हस्ताक्षर के साथ ही इसका अंत माना जाता है।
परन्तु क्या वर्साय की संधि वास्तव में प्रथम विश्व युद्ध का अंत थी या यह द्वितीय विश्व युद्ध का बीजारोपण थी ? अनेक समीक्षकों और इतिहासकारों का भी यही मानना है कि वर्साय की संधि प्रथम विश्व युद्ध के अंत पर नहीं बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के जन्म की भूमिका पर हस्ताक्षर थी। ऐसा मानने के अनेक कारण हैं। आप इतिहास के पन्ने पलट कर देखेंगे तो प्रथम विश्व युद्ध एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई थी। अपनी शक्तियों, सीमाओं और उपनिवेशों को हर बड़ा देश बढ़ाना चाह रहा था, परन्तु किसी दूसरे का विस्तार सभी को नागवार लग रहा था। जर्मनी अपनी सैन्य शक्तियों को बढ़ाते हुए दिनोंदिन अपने उपनिवेशों की संख्या भी बढ़ाता जा रहा था। यह बात उस समय के बड़े राष्ट्र इंग्लैंड, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और फ़्रांस को खटकने लगी। इन्होने जर्मनी के विस्तार को रोकने के लिए आपस में मिलकर मित्र राष्ट्रों का समूह बने और जर्मनी को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया। इस तरह वर्साय की संधि का जन्म हुआ। इतिहास में यह संधि एक विवादित संधि के नाम से जानी जाती है।
यह एक ऐसी संधि थी जिसने एक बड़े और शक्तिशाली राष्ट्र को हर तरह से पंगु बना दिया था। जर्मनी जैसा देश उसे ज्यादा समय तक ढ़ो नहीं सकता था। अंत में हुआ भी वही जिसका अंदेशा था।चांसलर एडोल्फ़ हिटलर की उत्पत्ति और द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारम्भ दोनों का गर्भस्थल वर्साय की संधि ही साबित हुआ।
आप इतिहास के पृष्ठ पलट कर देखेंगे तो पाएंगे कि मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी को इस संधि पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर दिया था। संधि का अर्थ होता है दोनों पक्षों में सहमति व समझौता। लेकिन यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था। इसमें मित्र राष्ट्रों की मनमर्जी से बहुत सी शर्ते और प्रतिबंधों का एक मसौदा बनाकर जर्मनी को हस्ताक्षर करने के लिए विवश कर दिया गया। हस्ताक्षर नहीं करने का अर्थ था कि सभी मित्र राष्ट्र मिलकर फिर से जर्मनी पर आक्रमण कर देंगे, जो उस समय जर्मनी झेलने की स्थिति में नहीं था।
वर्साय की संधि अनेक अर्थों में ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष है। जैसा कि पूर्व में बताया गया है कि यह प्रथम विश्व युद्ध के अंत के साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध का बीज भी थी। इसके अलावा एक और विशेष घटना के लिए भी यह प्रसिद्ध है , जो उस समय हुई थी। वह महत्वपूर्ण घटना थी-राष्ट्रसंघ का निर्माण एवं संगठन। वर्साय संधि की प्रथम 26 धाराएँ राष्ट्रसंघ का संविधान ही हैं, जिनका मकसद अंतर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा एवं सहयोग को बनाये रखना था।
परन्तु मित्र राष्ट्रों द्वारा जर्मनी को प्रथम विश्व युद्ध के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराते हुए उसकी बहुत सी भूमि छीन ली गयी, युद्ध की समस्त आर्थिक क्षति-पूर्ति उस पर लाद दी गई, उसकी सीमायें सीमित कर दी गई, सैन्य शक्ति बढ़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। इतना सब कुछ होना राष्ट्र संघ के निर्माण के उद्देश्य के भी विरूद्ध ही था, तो यह शांति कितने दिन चलने वाली थी?
अंत में वर्साय की संधि के दुष्परिणाम के रूप में इसके ठीक 20 वर्ष, 2 महीने और 4 दिन पश्चात् अर्थात् 1 सितम्बर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध का प्रारम्भ जर्मनी के चांसलर एडोल्फ हिटलर द्वारा नाज़ी सेना को पौलैंड पर आक्रमण के आदेश के साथ हुआ।
सीमा शर्मा


सहमति एवं मजबूरी शब्दों का अभिप्राय विश्व इतिहास के बड़े युद्धों के द्वारा सरल तरीके से समझाया गया सुंदर आलेख।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
हटाएंKnowledge booster
जवाब देंहटाएंWorld wars are devastating....this post makes us realise the importance of negotiation in every situation.... We should talk it out before taking any step.
हटाएंVery true
हटाएंItihaas ki jaankari deti achhi post hai.
जवाब देंहटाएंधन्यवाद
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