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सोमवार, 22 जून 2020

आत्मनिर्भर भारत

मनुज तू बस ठान ले, कदम बढ़ा प्रगति पथ पर ।

लक्ष्य पर स्थिर दृष्टि रख, और बन जा आत्मनिर्भर।

आत्मनिर्भर होने का सामान्य अर्थ है 'अपने पैरों पर खड़ा होना' या 'किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहना।' हर कोई चाहता है कि वो आत्मनिर्भर बने, उसे किसी चीज़ के लिए किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े।

कोरोना काल में बहुत से लोग आत्मनिर्भर बन गए हैं। मैंने चारों तरफ देखा और पाया कि सभी महिलाएँ जो रोजमर्रा के घरेलू कार्यों के लिए कामवाली बाई या मेड पर निर्भर रहती थीं, अपनी सुंदरता को बनाए रखने के लिए ब्यूटी पार्लरों पर निर्भर थीं, मिठाई व चाट के लिए बाजार पर निर्भर थीं और ऐसी ही अनेक चीजें जिनके लिए किसी न किसी पर निर्भर थीं, अब वे सभी कार्य वो घर पर ही करने लगीं। भले ही इन कार्यों में घर के सदस्य भी उसकी मदद कर रहे थे, पर वह बहुत हद तक ये कार्य स्वयं ही करने लगीं। यही तो आत्मनिर्भरता है, स्वावलम्बन है।

न केवल महिलाएँ, पुरुष भी इसमें कहाँ पीछे रहने वाले थे। वो भी अपने अनेकों काम स्वयं करने लगे, जैसे - दाढ़ी बनाना, बाल काटना, गाड़ी साफ़ करना, कपड़े प्रेस करना, घरेलू कार्यों में मदद करना इत्यादि। यह भी आत्मनिर्भरता ही है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है-

"यह पापपूर्ण परावलम्बन, चूर्ण होकर दूर हो,

फिर स्वावलम्बन का हमें, प्रिय पुण्य पाठ पढ़ाइए। "

कोरोना संकट ने हमें खुद पर विश्वास करना और आत्मनिर्भरता का महत्त्व समझा दिया है। हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी कह चुके हैं कि हमें 'आपदा को अवसर' में बदलने की आवश्यकता है। ख़ुशी की बात है कि देश ने इसकी शुरुआत भी कर दी है। इसके तहत हमारे देश में ऐसी अनेक चीजों का निर्माण शुरू हो गया है, जो हमारे देश में इससे पहले या तो बनती ही नहीं थी या फिर बहुत काम संख्या में इनका निर्माण होता था, जैसे- पी पी ई किट, वेंटिलेटर, एन-९५ मास्क इत्यादि।

प्रधानमंत्री ने हमारे देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए 'वोकल फॉर लोकल' अर्थात् स्थानीय वस्तुओं का प्रयोग एवं प्रचार करने पर भी बल दिया है। हम विदेशी चीजों के पीछे भागना छोड़कर स्वदेशी चीजें अपनाएँ तो उस चीज में हमारा देश आत्मनिर्भर बनने लगेगा और एक दिन हम उस चीज का निर्यात भी कर सकते हैं। इसके लिए हमें स्वयं ही पहल करनी होगी और अपने देशवासियों की मदद करनी होगी।

इसके लिए भी कवि मैथिलीशरण गुप्त ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में कहा है-

"अपने सहायक आप हो, होगा सहायक प्रभु तभी,

बस चाहने से किसी को, सुख नहीं मिलता कभी।"

कोरोना ने हमें आपदा को अवसर में बदलना सिखाया और आज देश की सीमा पर चीन के साथ जो स्थितियाँ बनी हुई हैं, वो हमें आगे बढ़कर आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रही हैं। अब समय आ गया है 'आत्मनिर्भर भारत' बनाने का, इसके लिए हमें दृढ़तापूर्वक कदम उठाते हुए लक्ष्य प्राप्त करना होगा। मोबाइल, दवाईयाँ, ऑटो पार्ट्स आदि ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें अभी हमें आत्मनिर्भर बनने की आवश्यकता है।

इसकी सफलता के लिए सरकार को चाहिए कि ऐसी वस्तुओं की एक सूची तैयार करे जो हम दूसरे देशों से आयात करते हैं। फिर एक योजना के तहत इस सूची को इनसे सम्बंधित कौशल - विभागों को भेजना चाहिए। इसके साथ ही यह निर्देश भी दे कि देश की युवा पीढ़ी और अनुभवी लोगों की टीम बनाकर उसमें कार्य करते हुए अच्छी वस्तु  तैयार की जाए।

इसके साथ ही चाहे तो पब्लिक की रूचि और विचार जानने के लिए भी कोई योजना बनाकर कार्य किया जाए, जिसमें सामान्य आदमी भी अपनी योजना और राय रख सके। बहुत बार बड़ी-बड़ी डिग्रीधारी लोग जो कार्य नहीं कर पाते हैं, वही काम सामान्य आदमी को यदि सही अवसर, सुविधा और साथ मिले तो कर सकता है। सरकार और देशवासियों को इस दिशा में मजबूत कदम उठाने की आवश्यकता है। जब हम कुछ करने का सोच लें तो असंभव कुछ भी नहीं है।

मशहूर कवि दुष्यंत कुमार ने भी अपनी पंक्तियों के माध्यम से शायद यही कहने का प्रयास किया है-

"कौन कहता है, आसमां में सूराख़ नहीं हो सकता,

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों"

                                                            सीमा शर्मा

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6 टिप्‍पणियां:

  1. Aatmanirbharta hi manushya ko sammanniye banati h
    Aatmanirbhar Bharat fir se vishva guru avashya banega. Jai Hind - Jai Bharat🇮🇳

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  2. भारतीय जन मन के लिए अत्यंत अनुकरणीय लेख एवं सरकारी तथा निजी तन्त्र हेतु भी उत्तम सुझाव हेतु हृदय से अभिनंदन।

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  3. Aaj samay ki maang bhi this kahti hai. Bahut acha lekh hai.

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