पापा की उंगली थाम के,
शहर सारा घूम आते थे।
झोली में सारे जहाँ की,
खुशियाँ समेट लाते थे।
वो भी क्या दिन थे बचपन
के, बस यादें बाकी रह गई हैं।
आज वो अकेले हैं घर में,
जो कभी हमें अकेला नहीं
छोड़ पाते थे।
जीवन में माता-पिता की भूमिका बहुत बड़ी है। माता के गुणों और महत्त्व की तो किसी से तुलना ही नहीं की जा सकती, परन्तु संतान के जीवन में पिता की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। माँ यदि हमारी प्यार-स्नेह से देखभाल करती है, तो पिता हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए मजबूत एवं सशक्त बनाते हैं। वो माँ की तरह अपना प्यार कभी दिखाते नहीं हैं, पर उन्हें भी माँ की तरह अपनी संतान की फिक्र होती है।
शायद इसीलिए पिता को नारियल के समान माना गया है। जिस तरह
नारियल ऊपर से सख्त लेकिन अंदर से नरम और मीठा होता है, उसी तरह पिता की आज्ञा एवं निर्देश हमें सख्त लग सकते हैं,
परन्तु उनका परिणाम भी नारियल के अंदर के भाग
की तरह मीठा और लाभदायक होता है। संतान को दुनियादारी की वास्तविकता का परिचय पिता
ही करवाता है। इस तरह वह माँ द्वारा दिए स्नेह और पिता की कठोरता का संतुलन भी
बनाता है।
मनुस्मृति में भी पिता को 'आचार्याणां शतं पिता' अर्थात् सौ आचार्यों के बराबर माना गया है। संस्कृत के एक श्लोक में पिता को ज्ञान कहा गया है, एक अन्य श्लोक में पिता को आकाश से भी उच्चतर माना गया है।
जिस तरह माँ के प्यार और स्नेह के सम्मान में मातृ दिवस अर्थात् मदर्स डे मनाया जाता है, वैसे ही पिता के त्याग और बलिदान को सम्मान देने के लिए पितृ दिवस अर्थात् फादर्स डे मनाया जाता है। विश्व के कुछ देशों में यह किसी अलग दिन भी मनाया जाता है, परन्तु भारत एवं कुछ अन्य देशों में यह जून के तीसरे रविवार को मनाया जाता है।
आओ आज हम प्रतिज्ञा लें कि जिस पिता ने बचपन में हमारी सारी जरूरतें पूरी करने के लिए अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं को अनदेखा कर हमारे चेहरे पर खुशियाँ ला दी, वृद्धावस्था में उन पिता की आँखों में हमारे कारण आँसू नहीं आने चाहिए।
नारियल से हो पापा तुम,
ऊपर से सख्त अंदर से नर्म।
पहले कही बातें जो लगती
थी कड़वी, अब समझ आया उनका
मर्म।
दिखाते नहीं कभी चेहरे पर
भाव, पर परवाह करते हो
मेरी।
प्रभु से विनती है मेरी,
भूलूँ न कभी मैं संतान
धर्म।
सीमा शर्मा


अत्यन्त प्रेरणात्मक एवं अनुकरणीय सन्देश।
जवाब देंहटाएंDhanywad
हटाएंपिता को शत शत नमन
जवाब देंहटाएंNaman
हटाएंBhavnatmak post😇👍
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